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UNESCO से दोबारा बाहर निकला अमेरिका; ट्रंप के फैसले पर वैश्विक प्रतिक्रिया!

यूनेस्को प्रमुख ने जताया अफसोस

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) से अमेरिका के बाहर निकलने का निर्णय लिया है। यह निर्णय दिसंबर 2026 के अंत तक प्रभाव में आएगा। इस फैसले पर यूनेस्को की महानिदेशक ऑड्री अज़ूले ने गहरा खेद जताते हुए कहा कि यह बहुपक्षवाद के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और अमेरिका के अनेक साझेदारों पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा।

यह दूसरी बार है जब ट्रंप प्रशासन ने यूनेस्को से अमेरिका को बाहर निकाला है। पहली बार यह कदम 2017 में उठाया गया था, जिसे बाद में जो बाइडन सरकार ने पलट दिया था। अब एक बार फिर ट्रंप प्रशासन ने इस फैसले को दोहराया है, इसे वोक और विभाजनकारी एजेंडा कहकर खारिज किया गया है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता अन्ना केली ने कहा कि “UNESCO ऐसे सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों को बढ़ावा देता है जो आम अमेरिकियों की सोच से मेल नहीं खाते।”

अमेरिकी विदेश विभाग ने यूनेस्को पर ग्लोबलिस्ट और वैचारिक एजेंडा को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया, जो कि ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति के खिलाफ है। खासतौर पर, 2011 में फिलिस्तीन को पूर्ण सदस्यता देने के निर्णय को अमेरिका के हितों के विरुद्ध बताया गया। इज़रायल ने अमेरिका के इस निर्णय का स्वागत किया है। इज़राइली विदेश मंत्री गिदोन सार ने वॉशिंगटन को “नैतिक समर्थन और नेतृत्व” के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि यूनेस्को में “इज़रायल के खिलाफ लगातार पूर्वाग्रह” रहा है।

महानिदेशक ऑड्री अज़ूले ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि यह निर्णय निराशाजनक लेकिन अपेक्षित था। उन्होंने बताया कि 2018 से संगठन ने अपने वित्तीय ढांचे में बड़े सुधार किए हैं और अब अमेरिकी फंडिंग केवल 8% बजट का हिस्सा है, जबकि पहले यह कई UN एजेंसियों में 40% तक था।

उन्होंने बताया कि संगठन ने पिछले कुछ वर्षों में अपने मिशन को प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाया है—जैसे कि मोसुल (इराक) के ऐतिहासिक शहर का पुनर्निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नैतिक उपयोग पर वैश्विक मानक बनाना, और यूक्रेन, लेबनान, यमन जैसे संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में शिक्षा और संस्कृति के संरक्षण के लिए व्यापक कार्यक्रम चलाना। UNESCO ने होलोकॉस्ट शिक्षा और यहूदी विरोधी नफरत के खिलाफ काम करते हुए 85 देशों में शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया है। अज़ूले ने यह भी दोहराया कि “UNESCO सभी देशों का स्वागत करता है, अमेरिका आज भी स्वागत योग्य है और भविष्य में भी रहेगा।”

अमेरिकी सीनेट की डेमोक्रेट सदस्य जीन शाहीन ने ट्रंप के फैसले को अल्पदृष्टि वाला बताते हुए कहा कि यह चीन के पक्ष में एक जीत है, क्योंकि पिछले बार अमेरिका के बाहर होने के बाद चीन सबसे बड़ा दानदाता बन गया था। वहीं, फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने UNESCO को विश्व विरासत का रक्षक बताते हुए अमेरिका के फैसले की आलोचना की और फ्रांस की मजबूत प्रतिबद्धता को दोहराया।

1945 में स्थापित UNESCO वर्तमान में 194 सदस्य देशों का संगठन है, जो शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति और संचार के माध्यम से वैश्विक शांति को बढ़ावा देता है। इसका मुख्यालय पेरिस में है और यह 2,000 से अधिक विश्व धरोहर स्थलों, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों और वैश्विक भू-उद्यानों की निगरानी करता है।

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