साने ताकाइची को चुनाव जिताकर चीन को क्या संदेश देना चाहता है जापान?

साने ताकाइची को चुनाव जिताकर चीन को क्या संदेश देना चाहता है जापान?

What message does Japan want to send to China by electing Sanae Takaichi?

जापान में अचानक हुए आम चुनाव ने देश-विदेश की राजनीति में परतें हिलाई है। प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने अपने नेतृत्व में ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए संसद के निचले सदन में दो-तिहाई से अधिक सीटें हासिल कर ली हैं। इस प्रचंड जनादेश के साथ ताकाइची न केवल जापान की सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्रियों में शामिल हो गई हैं, बल्कि उनके आक्रामक आर्थिक और रक्षा एजेंडे को भी स्पष्ट राजनीतिक वैधता मिल गई है। विश्लेषकों के अनुसार, यह परिणाम क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और विशेष रूप से चीन के लिए एक स्पष्ट संदेश है।

रविवार (8 फरवरी)को हुए चुनाव में लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) और उसकी सहयोगी जापान इनोवेशन पार्टी (इशिन) ने मिलकर कुल 316 सीटें जीतीं, जो युद्धोत्तर जापान के इतिहास में एक रिकॉर्ड है। यह जीत ताकाइची को वह दो-तिहाई सुपरमैजोरिटी दे चुकी है, जिससे वह न केवल निचले सदन में विपक्ष पर हावी हैं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर विपक्ष-नियंत्रित उच्च सदन की बाधाओं को भी पार कर सकती हैं। इस उपलब्धि के बाद उन्हें जापान की आयरन लेडी के रूप में भी संबोधित किया जा रहा है।

यह जनादेश ताकाइची की सानेनोमिक्स अर्थात उनकी आक्रामक आर्थिक नीतियों के लिए निर्णायक समर्थन माना जा रहा है। मतदाताओं ने आर्थिक वृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिए विस्तारवादी खर्च के उनके प्रस्तावों का समर्थन किया है। इसमें खाद्य पदार्थों पर लगाए गए 8 प्रतिशत उपभोग कर को दो वर्षों के लिए निलंबित करने का उनका प्रमुख वादा भी शामिल है।  यह जीत चीन के प्रति उनकी शक्ति के माध्यम से शांति लाने की नीति के लिए भी सार्वजनिक मुहर के रूप में देखी जा रही है। इस जनादेश के साथ ताकाइची अब सैन्य खर्च बढ़ाने और लंबे समय से लंबित संवैधानिक सुधारों की दिशा में कदम बढ़ा सकती हैं।

हालांकि यह चुनाव ताकाइची के लिए आसान नहीं था। अक्टूबर 2025 में शिगेरु इशिबा के इस्तीफे के बाद सत्ता संभालने वाली ताकाइची ने जनवरी में अचानक  चुनाव कराने का फैसला किया था। आलोचकों ने इसे राजनीतिक अवसरवाद बताते हुए चीन के साथ संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव की चेतावनी दी थी, खासकर ऐसे समय में जब दक्षिण चीन सागर और उत्तरी प्रशांत में बीजिंग की गतिविधियों को लेकर तनाव बढ़ रहा था।

चुनाव से पहले के दिनों में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति भी तेज रही। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुलकर ताकाइची का समर्थन किया और चीन की ताइवान नीति के मुकाबले मजबूत अमेरिका–जापान गठबंधन पर जोर दिया। जीत के बाद ट्रंप ने सोशल मीडिया पर उन्हें बधाई देते हुए रूढ़िवादी शक्ति के माध्यम से शांति के एजेंडे को आगे बढ़ाने में महान सफलता की कामना की।

वहीं, बीजिंग ने ताकाइची के ताइवान की संप्रभुता पर दिए गए बयानों के बाद उन्हें कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश की। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के अनुसार, चीन ने पिछले सप्ताह दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के राजदूतों और उनके प्रतिनिधियों की एक बैठक बुलाई। रिपोर्ट में कहा गया कि बैठक में देशों पर जापान के खिलाफ चीन के रुख के साथ खड़े होने का दबाव डाला गया और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी आक्रमणों का हवाला दिया गया।

लेकिन एलडीपी की भारी जीत के बाद चीन की यह रणनीति उलटी पड़ती दिख रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम न केवल ताकाइची की घरेलू पकड़ को मजबूत करता है, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति में जापान की स्थिति को भी पहले से कहीं अधिक सशक्त बनाता है।

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