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जनजातियों के गांवों में मिशनरियों के प्रवेश पर रोक का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

हाईकोर्ट के फैसले को रखा बरकरार

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सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ के आदिवासी गांवों में ईसाई मिशनरियों और पादरियों के प्रवेश पर लगाए गए प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। यह मामला ग्राम सभाओं द्वारा पारित प्रस्तावों और अनुसूचित क्षेत्रों में लगाए गए उन होर्डिंग्स से जुड़ा था, जिनमें धर्मांतरण गतिविधियों के प्रति चेतावनी दी गई थी।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें प्रलोभन और छल के माध्यम से किए जा रहे धर्मांतरण तथा उनके सामाजिक सौहार्द और आदिवासी सांस्कृतिक पहचान पर प्रभाव को लेकर विस्तृत टिप्पणियां की गई थीं।

याचिकाकर्ता दिगबल टांडी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर किसी ठोस सामग्री के बिना ईसाई मिशनरी गतिविधियों पर व्यापक और प्रतिकूल टिप्पणियां कीं। उनका कहना था कि हाईकोर्ट के समक्ष मुद्दा सीमित था, लेकिन धर्मांतरण पर की गई टिप्पणियां याचिका के दायरे से बाहर थीं।

गोंजाल्विस ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट में 700 से अधिक पादरियों पर प्रार्थना सभाओं के दौरान हुए हमलों से संबंधित एक मामला लंबित है। उन्होंने यह भी कहा कि ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों को गांवों में दफनाने का अधिकार नहीं दिया जा रहा। एक अन्य मामले का हवाला देते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि धर्मान्तरित लोगों के दफनाए गए शवों को कब्र से निकाला जा रहा है।  तर्क दिया कि पिछले दस वर्षों में राज्य के धर्मांतरण कानून के तहत एक भी सजा नहीं हुई है।

उन्होंने कहा, “आप मुझे रविवार की प्रार्थना सभा करने से नहीं रोक सकते। और हाई कोर्ट का कहना है कि यह गैर-कानूनी नहीं है। हाईकोर्ट की टिप्पणियों के व्यापक परिणाम होंगे।” राज्य की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता उपस्थित हुए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठाए जा रहे कई आरोप हाईकोर्ट में मूल याचिका का हिस्सा नहीं थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के समक्ष मामला केवल होर्डिंग्स हटाने तक सीमित था और याचिकाकर्ताओं को संबंधित ग्राम सभाओं के पास जाने का निर्देश दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के पक्ष से सहमति जताते हुए कहा कि हाईकोर्ट के समक्ष रिट याचिका का दायरा सीमित था। पीठ ने टिप्पणी की, “मिस्टर गोंसाल्वेस, कृपया हाई कोर्ट में दायर रिट पिटीशन और मांगी गई राहत देखें। आपको ग्राम सभा में जाने के लिए कहा गया है।” इसके साथ ही याचिका खारिज कर दी गई और हाईकोर्ट के तर्क और टिप्पणियां प्रभावी रूप से बरकरार रहीं।

यह विवाद कांकेर जिले के आठ जनजातीय गांव कुदल, परवी, जुनवानी, घोटा, घोटिया, हाबेचुर, मुसुरपुट्टा और सुलागी की ग्राम सभाओं द्वारा पारित प्रस्तावों से जुड़ा है। गांवों में पंचायती राज (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम के तहत होर्डिंग्स लगाए गए थे, जिनमें पादरियों और पुरोहितों के प्रवेश पर रोक का उल्लेख था।

दिगबल टांडी ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर दावा किया था कि इन प्रस्तावों और होर्डिंग्स के माध्यम से ईसाई पादरियों और धर्मांतरित लोगों के प्रवेश पर प्रभावी प्रतिबंध लगाया गया है। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(d) और 25 का उल्लंघन बताया। साथ ही आरोप लगाया कि ईसाईयों को दफनाने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है, सामाजिक बहिष्कार और जबरन विस्थापन हो रहा है तथा सांप्रदायिक तनाव बढ़ाया जा रहा है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की पीठ ने होर्डिंग्स पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि अवैध या जबरन धर्मांतरण के खिलाफ चेतावनी देने वाले बैनर लगाना अपने आप में असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।

अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने कहा कि धर्मांतरण भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में लंबे समय से संवेदनशील विषय रहा है। संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। न्यायालय ने कहा कि जब धर्मांतरण व्यक्तिगत आस्था के बजाय प्रलोभन या कमजोर वर्गों के शोषण का परिणाम बन जाता है, तो वह सांस्कृतिक दबाव का रूप ले लेता है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि अनुच्छेद 25 पूर्ण अधिकार नहीं है और यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। अदालत ने याचिकाकर्ता के भेदभाव संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ऐसा कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह साबित हो कि होर्डिंग्स ईसाइयों के खिलाफ भेदभाव को अधिकृत करते हैं।

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