देश में शहर की ओर बढ़ते पलायन, जिससे परिवार व्यवस्था में हो रहे विघटन और नई पीढ़ी का अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होना, यह घटनाएं सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के खिलाफ चुनौती बनकर उभरी है। इन परिस्थितियों के बीच महाराष्ट्र के पालघर जिले के वाडा में एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहल की शुरुआत की गई। गुड़ी पाड़वा एवं चैत्र नवरात्रि के अवसर पर एकतारा गुरुकुल द्वारा आयोजित ‘त्रिकर्म उत्सव’ के दौरान 172 गांवों के 1008 परिवारों ने ‘गृह गुरुकुल’ स्थापित करने का सामूहिक संकल्प लिया। यह पहल देश के लिए एक नए सामाजिक मॉडल के रूप में उभर रही है।
इस भव्य कार्यक्रम में सांसद डॉ. हेमंत विष्णु सवरा, वरिष्ठ नेता बाबाजी काठोले, वाडा नगर पंचायत की अध्यक्ष रीमा गांधे, संस्कार भारती के अखिल भारतीय कार्यकर्ता संजय गोडसे, वाडा इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद खोसला, गोवर्धन इको विलेज के प्रतिनिधि अभिमन्यु प्रभु जी, एकतारा गुरुकुल के संचालक आकाश नारायण बिस्वास एवं कार्यक्रम व्यवस्था प्रमुख मिलिंद वाडेकर उपस्थित रहे। इस अवसर पर 172 गांवों के सरपंच, पुलिस पाटिल, मीडिया प्रतिनिधि और हजारों ग्रामीण बड़ी संख्या में शामिल हुए।
कार्यक्रम में सांसद डॉ. हेमंत सवरा ने एकतारा गुरुकुल के इस उपक्रम की सराहना करते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक के युग में भारतीय परंपराओं और संस्कारों को संरक्षित करने के लिए ऐसे प्रयास अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि परंपरा, रीति-रिवाज और संस्कार ही भारत की पहचान हैं और उनका संरक्षण अनिवार्य है।
इस उत्सव का मुख्य आकर्षण रहा ‘गृह गुरुकुल अभियान’, जिसका उद्देश्य परिवार को पुनः शिक्षा, संस्कार और कुल परंपरा का केंद्र बनाना है। “परिवार ही पहला गुरुकुल है” इस विचार के साथ 172 गांवों के 1008 परिवारों ने मिलकर जीवन मूल्यों के पुनर्जागरण का संकल्प लिया।
कार्यक्रम के आयोजक आकाश नारायण बिस्वास ने कहा, “जब तक माता-पिता स्वयं गुरु नहीं बनेंगे, तब तक घर प्राथमिक गुरुकुल नहीं बन सकता। यदि घर गुरुकुल नहीं होगा, तो नई पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर होती जाएगी, जिससे पलायन, जमीन विवाद और पारिवारिक विघटन बढ़ेगा। ‘गृह गुरुकुल’ इसका प्रभावी समाधान हो सकता है।”
इस संदर्भ में कुदली श्रींगेरी शारदा पीठ के शंकराचार्य श्री श्री अभिनव शंकर भारती ने वीडियो संदेश के माध्यम से कहा कि भारतीय संस्कृति कुल परंपरा पर आधारित है। कुलदेवता, कुलगुरु, कुलविद्या, कुलाचार और कुलवृत्ति के संरक्षण से ही सर्वांगीण विकास संभव है। उन्होंने एकतारा गुरुकुल की इस पहल को अत्यंत प्रशंसनीय बताया।
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा ‘आईचा पदर’ था, जो 172 गांवों की लगभग 450 माताओं की साड़ियों से बनाया गया एक भव्य स्वागत द्वार था। यह दृश्य मातृशक्ति की एकता और सांस्कृतिक जागरूकता का सशक्त प्रतीक बनकर उभरा।
कार्यक्रम में गांव देवी सजावट प्रतियोगिता में कोने गांव को प्रथम (₹25,000) और भोपिबली गांव को द्वितीय (₹15,000) पुरस्कार मिला। इसके अलावा सबसे बड़े संयुक्त परिवार सम्मान में श्रीराम भास्कर अंबावणे परिवार प्रथम, जयवंत मोतीराम अंबावणे परिवार द्वितीय तथा पालकर बंधु परिवार तृतीय स्थान पर सम्मानित किए गए। कुलवृक्ष (वंशावली) प्रतियोगिता में 150 विद्यार्थियों ने भाग लिया, जबकि 35 महिलाओं ने गुड़ी पाड़वा फैशन शो में पारंपरिक वेशभूषा में प्रस्तुति दी।
एकतारा गुरुकुल के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत भरतनाट्यम, तबला वादन, गायन, तारपा नृत्य और नाट्य प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। गुरुमाता अरुणा देवी बिस्वास के संगीत ने कार्यक्रम को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की। कलाकारों ने कहा,“हम केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज निर्माण के लिए प्रस्तुति करते हैं।”
172 गांवों और 1008 परिवारों की भागीदारी इस पहल को देशभर में लागू किए जा सकने वाले एक विस्तार योग्य सामाजिक मॉडल के रूप में प्रस्तुत करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि परिवार आधारित शिक्षा और संस्कार प्रणाली के माध्यम से समाज की कई समस्याओं का समाधान जड़ से किया जा सकता है।
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