वुलर झील तक पहुँचा पहलगाम हमले का असर: पर्यटन पड़ा ठप, शिकारा के रोजी रोटी पर संकट !

मंज़ूर अहमद, जिनकी रोज़ाना आमदनी कभी 1500 रुपये तक पहुंचती थी, अब मुश्किल से 100 रुपये भी नहीं कमा पा रहे।

वुलर झील तक पहुँचा पहलगाम हमले का असर: पर्यटन पड़ा ठप, शिकारा के रोजी रोटी पर संकट !

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कश्मीर की वादियों में 22 अप्रैल को पहलगाम की बैसरन घाटी में हुए भीषण आतंकी हमले की गूंज अब केवल सुरक्षा हलकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर आम कश्मीरी की जेब और ज़िंदगी पर भी पड़ रहा है। एशिया की दूसरी सबसे बड़ी मीठे पानी की झील, वुलर झील, जो कभी सैलानियों से गुलज़ार रहती थी, अब वीरान पड़ी है। शिकारा मालिक दिनभर घाट पर बैठे रहते हैं, लेकिन पर्यटकों की नाव अब उस पार नहीं जाती।

शिकारा चलाकर अपने परिवार का पेट पालने वाले हसन बेबस होकर कहते हैं, “हम पूरे दिन इंतजार करते हैं, लेकिन कोई नहीं आता। कश्मीर अपने आतिथ्य के लिए जाना जाता है। हम शांति और पर्यटन की बहाली की मांग करते हैं। पहलगाम हमले की हम कड़ी निंदा करते हैं, यह मानवता पर हमला है।” एक अन्य शिकारा चालक मंज़ूर अहमद, जिनकी रोज़ाना आमदनी कभी 1500 रुपये तक पहुंचती थी, अब मुश्किल से 100 रुपये भी नहीं कमा पा रहे। उन्होंने उम्मीद के स्वर में कहा कि पर्यटक फिर लौटें, ताकि घाटी की खूबसूरती फिर मुस्कुरा सके।

पहलगाम हमले के बाद से कश्मीर घाटी का पर्यटन उद्योग ठहर गया है। अप्रैल-मई के महीनों में जब वुलर झील, डल झील और गुलमर्ग जैसे स्थलों पर रौनक होती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। होटल, टैक्सी, रेस्तरां और हस्तशिल्प जैसे सहायक व्यवसायों को भी इस गिरावट ने झकझोर दिया है। पर्यटकों की अनुपस्थिति ने केवल अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि घाटी के सामाजिक मनोबल को भी चोट पहुंचाई है।

इसी पृष्ठभूमि में श्रीनगर की डल झील में राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) ने मॉक ड्रिल का आयोजन किया है। गृह मंत्रालय ने 7 मई को देशभर में सिविल डिफेंस मॉक ड्रिल कराने का निर्देश दिया है, ताकि आपातकालीन स्थितियों में नागरिक सुरक्षा को परखा और दुरुस्त किया जा सके।

साथ ही, सीमावर्ती क्षेत्रों में भी स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी सेना द्वारा 12 दिनों तक संघर्षविराम का उल्लंघन किए जाने के बाद, पुंछ और अन्य सीमावर्ती इलाकों में पुलिस, सीआरपीएफ और एसओजी ने नाकेबंदी और तलाशी अभियान तेज कर दिए हैं।

यह स्पष्ट है कि आतंकवाद की मार सबसे पहले उस आम इंसान पर पड़ती है, जो रोज़ अपनी मेहनत से जीवन चलाता है। कश्मीर को फिर मुस्कुराने के लिए, न केवल सुरक्षा बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक पुनर्जीवन की ज़रूरत है। और वह तब तक मुमकिन नहीं जब तक भय का बादल न हटे और शांति का सूरज फिर न चमके।

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