भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) की आज होने वाली बोर्ड बैठक में स्टार्टअप्स, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSUs) और विदेशी निवेशकों से जुड़े कई अहम प्रस्तावों पर चर्चा की संभावना है। बैठक में जिन विषयों पर फैसला हो सकता है, वे भारत की पूंजी बाजार संरचना और स्टार्टअप इकोसिस्टम को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं।
SEBI के एजेंडे में सबसे अहम मुद्दा यह है कि क्या स्टार्टअप संस्थापक IPO के बाद भी ईएसओपी (Employee Stock Option Plans) रख सकते हैं या नहीं। मौजूदा नियमों के मुताबिक, जब कोई संस्थापक प्रमोटर के रूप में वर्गीकृत हो जाता है, तो उन्हें ईएसओपी लेने की अनुमति नहीं होती।
हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि IPO से पहले दिए गए ईएसओपी का उपयोग प्रमोटर बनने के बाद भी किया जा सकता है या नहीं। कई न्यू-एज टेक स्टार्टअप्स में संस्थापक शुरुआती दिनों में वेतन के बजाय ईएसओपी लेते हैं, इसलिए यह प्रस्ताव खासा संवेदनशील माना जा रहा है।
SEBI इस पर एक साल की ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ का प्रस्ताव भी ला सकता है ताकि IPO से ठीक पहले ईएसओपी के दुरुपयोग को रोका जा सके।
SEBI की बैठक में पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) की स्वैच्छिक डीलिस्टिंग को लेकर भी नया ढांचा पेश किया जा सकता है। अगर किसी सरकारी कंपनी में सरकार की हिस्सेदारी 90% से अधिक है, तो वह शेयर बाजार से बाहर निकलने की पात्र हो सकती है।
इस प्रस्ताव के पीछे कारण है कि कई PSUs में सार्वजनिक शेयरधारिता बेहद कम है, साथ ही उनका वित्तीय प्रदर्शन और बिज़नेस मॉडल भी कमजोर होते जा रहे हैं। इस मुद्दे पर मई 2025 में एक डिस्कशन पेपर जारी किया गया था।
SEBI, उन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिए अनुपालन नियमों को सरल बनाने पर विचार कर सकता है, जो केवल भारतीय सरकारी बॉन्ड (IGB) में निवेश करते हैं। इससे भारत की बॉन्ड मार्केट में विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा, बोर्ड बैठक में Qualified Institutional Placement (QIP) से जुड़े डिस्क्लोजर स्टैंडर्ड को सरल करने पर भी चर्चा हो सकती है, जिससे कंपनियों के लिए पूंजी जुटाना और आसान बन सके।
SEBI की यह बैठक स्टार्टअप्स से लेकर सार्वजनिक कंपनियों तक के लिए नीति में बड़े बदलावों का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। ईएसओपी नीति में स्पष्टता, पीएसयू के लिए आसान डीलिस्टिंग, एफपीआई निवेशकों को सहूलियत और QIP डिस्क्लोजर मानकों में ढील — ये सभी फैसले भारतीय पूंजी बाजार में निवेशकों के विश्वास को और मजबूत कर सकते हैं।
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