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Tuesday, January 27, 2026
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पुणे पोर्श हादसा: नाबालिग आरोपी पर वयस्क की तरह नहीं चलेगा मुकदमा!

किशोर न्याय बोर्ड का बड़ा फैसला

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पुणे के बहुचर्चित पोर्श एक्सीडेंट केस में बड़ा मोड़ आया है। किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) ने मंगलवार (15 जुलाई) को फैसला सुनाया कि आरोपी नाबालिग पर वयस्क के तौर पर मुकदमा नहीं चलेगा। यह फैसला पीड़ित परिवारों और जनता के उस उम्मीद के विपरीत आया है, जिसमें आरोपी को सख्त सजा की मांग की जा रही थी।

19 मई, 2024 की रात पुणे के कल्याणी नगर इलाके में एक पोर्श कार, जिसे उस समय नाबालिग चला रहा था, ने आईटी प्रोफेशनल्स अनीश अवधिया और अश्विनी कोष्टा को रौंद दिया था। दोनों दोपहिया वाहन से घर लौट रहे थे जब यह दर्दनाक हादसा हुआ।

इस केस की सबसे चौंकाने वाली परत तब सामने आई जब यह आरोप लगे कि पोर्श चला रहे नाबालिग की शराब पीने की पुष्टि से बचने के लिए उसके खून का सैंपल बदल दिया गया। इस मामले में अब तक कुल 9 आरोपी जेल में हैं,

  • विशाल अग्रवाल (नाबालिग का पिता)
  • डॉ. अजय तावरे और डॉ. श्रीहरी हलनोर (ससून अस्पताल)
  • अतुल घाटकंबले (अस्पताल कर्मचारी)
  • अशफाक मकानदार और अमर गायकवाड़ (मामले में आर्थिक लेनदेन कराने के आरोपी बिचौलिये)
  • आदित्य अविनाश सूद और अरुण कुमार सिंह (कार में मौजूद अन्य दो नाबालिगों के पिता)
  • आशीष मित्तल (अरुण सिंह का दोस्त, जिसके बेटे के बजाय उसका सैंपल लिया गया)

हाल ही में आरोपी की मां शिवानी अग्रवाल को कोर्ट ने जमानत दे दी थी। वह भी खून के नमूने बदलवाने की साजिश में शामिल बताई गई थीं।

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने यह आरोप लगाया कि आरोपी पक्ष कोर्ट में अनावश्यक याचिकाएं दाखिल कर केस को जानबूझकर लंबा खींच रहा है। सरकारी वकील ने कोर्ट को बताया कि उनके पास डीएनए परीक्षण के पुख्ता सबूत हैं, जो यह साबित करते हैं कि आरोपी का ब्लड सैंपल उसकी मां के सैंपल से बदल दिया गया था। उन्होंने सभी आरोपियों पर चार्ज फ्रेम करने की मांग की है।

किशोर न्याय बोर्ड का यह फैसला कि आरोपी को वयस्क के रूप में ट्रायल का सामना नहीं करना पड़ेगा, पीड़ितों के परिवारों के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब गंभीर साजिशों, सबूतों के साथ छेड़छाड़ और प्रभावशाली रसूखदार लोगों की मिलीभगत सामने आ चुकी है, तब क्या नाबालिग कहकर आरोपी को संरक्षण देना न्यायसंगत है?

यह मामला अब केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं रह गया है, बल्कि भारत में प्रभावशाली परिवारों और कानूनी व्यवस्था के बीच टकराव का प्रतीक बन गया है। न्याय मिलने की राह लंबी होती जा रही है, लेकिन जनभावना इस केस की हर एक परत पर नज़र रखे हुए है।

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