कोर्ट ने कहा,
“यह चुनाव आयोग का क्षेत्राधिकार है कि वह किसी पार्टी के पंजीकरण की समीक्षा करे। ऐसे मामलों में अदालत सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती जब तक कि कोई ठोस कानूनी आधार न हो।”
ओवैसी ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया और कहा कि उनके खिलाफ बार-बार इस तरह की याचिकाएं सिर्फ राजनीतिक बदले की भावना से दाखिल की जाती हैं। उन्होंने कहा, “हम भारतीय संविधान के दायरे में रहकर राजनीति करते हैं। न्यायपालिका ने आज फिर लोकतंत्र को मजबूत किया है।”
चुनाव आयोग ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि जब तक कोई पार्टी कानूनी रूप से पंजीकृत है और उसके खिलाफ कोई आपराधिक या संवैधानिक उल्लंघन साबित नहीं होता, तब तक वह सक्रिय रह सकती है।
यह मामला भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में राजनीतिक दलों की स्वायत्तता और संविधान के दायरे में कार्य करने के अधिकार से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक बार फिर साबित करता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक विचारधारा का सम्मान देश के लोकतांत्रिक मूल्यों का हिस्सा है।
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