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Tuesday, January 13, 2026
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सावन विशेष: शिव के अंगों से जुड़े उत्तराखंड के पांच रहस्यमयी मंदिर!

ये स्थान आज पंच केदार के रूप में पूजे जाते हैं। केदारनाथ ‘कूबड़’, मद्महेश्वर ‘नाभि’, तुंगनाथ ‘भुजाएं’, रुद्रनाथ ‘चेहरा’ और कल्पेश्वरनाथ ‘जटा’ के रूप में हैं।

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सावन का पावन माह चल रहा है। शिवालय में भक्तों की लंबी-लंबी कतारें हैं तो ‘हर हर महादेव’ की गूंज चहुंओर है। देश में ऐसे कई मंदिर हैं, जो भक्तों के लिए बेहद खास और रहस्य से भरे हुए हैं।
इन्हीं में शामिल है, उत्तराखंड का ‘पंच केदार’ मंदिर। यहां बसे पंच केदार मंदिर में केदारनाथ, मद्महेश्वरनाथ, तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पेश्वरनाथ न केवल आध्यात्मिक महत्व रखते हैं, बल्कि यहां प्राकृतिक सौंदर्य और पौराणिक कथाओं का भी संगम है।

खास बात है कि ये मंदिर भगवान शिव के विभिन्न अंगों से जुड़े हैं, जो पांडवों की महाभारत कथा से संबंधित हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत के युद्ध में हुए रक्तपात का प्रायश्चित करने के लिए पांडव भगवान शिव का आशीर्वाद लेने हिमालय पहुंचे थे। लेकिन, शिव जो बैल का रूप धारण कर छिप रहे थे, पांडवों से बचना चाहते थे। भीम ने शिव को पहचान लिया, और जब शिव धरती में समाने लगे, तब उनके शरीर के विभिन्न हिस्से पांच स्थानों पर प्रकट हुए।

ये स्थान आज पंच केदार के रूप में पूजे जाते हैं। केदारनाथ ‘कूबड़’, मद्महेश्वर ‘नाभि’, तुंगनाथ ‘भुजाएं’, रुद्रनाथ ‘चेहरा’ और कल्पेश्वरनाथ ‘जटा’ के रूप में हैं।

उत्तराखंड पर्यटन विभाग की ऑफिशियल वेबसाइट के अनुसार, पंच केदार यात्रा न केवल आध्यात्मिक अनुभव है, बल्कि हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता को करीब से देखने का अवसर भी है। यूं तो यहां साल भर भक्तों की भीड़ होती है, मगर महाशिवरात्रि और सावन में भक्तों की विशेष भीड़ देखने को मिलती है।

केदारनाथ मंदिर या शिव का कूबड़ रुद्रप्रयाग जिले में 3,584 मीटर की ऊंचाई पर बसा पंच केदार का प्रमुख केंद्र है। बर्फीली चोटियों और घने जंगलों से घिरा यह मंदिर शिव के कूबड़ का प्रतीक है। गौरीकुंड से शुरू होने वाला 19 किलोमीटर का ट्रैक तीर्थयात्रियों को प्रकृति और आध्यात्म का अनूठा संगम दिखाता है।

तुंगनाथ की गिनती दुनिया के सबसे ऊंचे शिव मंदिरों में की जाती है। यह 3,680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित विश्व का सबसे ऊंचा शिव मंदिर है। यहां शिव की भुजाओं की पूजा होती है।

रुद्रनाथ का मंदिर 2,286 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां शिव को नीलकंठ महादेव के रूप में पूजा जाता है। यह मंदिर अल्पाइन घास के मैदानों और रोडोडेंड्रोन जंगलों से घिरा है। गोपेश्वर से शुरू होने वाले 20 किलोमीटर के ट्रैक में सूर्य कुंड और चंद्र कुंड जैसे पवित्र जलाशय भक्तों को आकर्षित करते हैं।

इसके बाद मद्महेश्वरनाथ मंदिर का स्थान है। 3,289 मीटर की ऊंचाई पर बसा मद्महेश्वर मंदिर शिव की नाभि का प्रतीक है। यह मंदिर शांति और भक्ति का अनूठा संगम है।

कल्पेश्वरनाथ मंदिर को जटाओं का धाम भी कहा जाता है। यह मंदिर साल भर खुला रहता है और पंच केदार मंदिरों का अंतिम पड़ाव है।

 
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