अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर कड़े आर्थिक कदम उठाते हुए जहां steep tariffs (शुल्क) लगाए हैं, वहीं पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते मज़बूत करने की कोशिशें तेज़ कर दी हैं। इस नीति बदलाव ने भारत-अमेरिका संबंधों पर गहरी बहस छेड़ दी है।
पिछले 25 सालों से भारत और अमेरिका के बीच संबंध पारस्परिक सम्मान और साझा हितों पर आधारित रहे हैं। लेकिन ट्रंप प्रशासन के तहत यह संतुलन बदलता दिख रहा है। न्यूज़वीक के राजनीति संपादक कार्लो वर्सानो लिखते हैं, “ट्रम्प ने, हालांकि इसके कारण अभी भी अस्पष्ट हैं, नई दिल्ली और मोदी सरकार के प्रति विशेष रूप से आक्रामक रुख अपनाया है, जबकि वह और लोकलुभावन मोदी दोनों कई मायनों में एक जैसे हैं।”
व्हाइट हाउस ने हाल ही में घोषणा की कि भारत से आने वाले सामानों पर शुल्क अगले सप्ताह 25% से बढ़ाकर 50% कर दिया जाएगा—जो किसी भी अमेरिकी व्यापार साझेदार पर लगाए गए सबसे ऊँचे शुल्कों में से एक है। भारत ने 1990 में औसत 56% की दर से शुल्क लगाना शुरू किया था, जिसे धीरे-धीरे घटाकर आज 5% से भी नीचे ला दिया है। इस संदर्भ में वर्सानो सवाल उठाते हैं,“ट्रम्प क्यों मानते हैं कि विकासशील देशों को धमकाना एक वैश्विक प्रभुत्वशाली देश के लिए उचित व्यवहार है, यह उनके व्यापार एजेंडे के सबसे पेचीदा प्रश्नों में से एक है।”
ट्रंप का तर्क है कि भारत अब भी रूस से तेल खरीद रहा है और उसे रियायती दर पर बेचकर लाभ कमा रहा है। पूर्व हेज फंड मैनेजर स्कॉट बेसेंट ने भारत पर “profiteering” का आरोप लगाया। इस पर वर्सानो ने पलटवार किया,“ क्या यह बाज़ार की गतिशीलता का लाभ उठाकर अच्छा व्यवसाय नहीं है? बेसेन्ट का ‘अवसरवादी मध्यस्थता’ की शिकायत करना थोड़ा अजीब लगता है।’”
कश्मीर में आतंकी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराने में ट्रंप ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। पाकिस्तान ने उन्हें इसके लिए सार्वजनिक धन्यवाद दिया और यहां तक कि नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन भी हुआ।लेकिन भारत ने विदेशी दखल को खारिज कर दिया। वर्सानो लिखते हैं,“ ऐसा लगता है कि ट्रम्प ने इस बात को समझ लिया है कि यह उनके द्वारा विकसित किए जा रहे शांति-निर्माता व्यक्तित्व का अपमान है, और इसी के अनुरूप वे जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं।”
विश्लेषकों के अनुसार, ट्रंप के MAGA समर्थक आधार में भारत-विरोधी भावना गहरी है, खासकर H-1B वीज़ा और अमेरिकी तकनीकी नौकरियों में भारतीयों की बढ़ती उपस्थिति को लेकर। वर्सानो के शब्दों में, “एमएजीए के जमीनी स्तर पर भारतीयों के प्रति नस्लवाद और विदेशी द्वेष का भाव बहुत चौंकाने वाला है और मैं आसानी से हैरान नहीं होता।”
इसके उलट, ट्रंप पाकिस्तान की सैन्य नेतृत्व को वॉशिंगटन आमंत्रित कर रहे हैं, भले ही पाकिस्तान पर चीन की नज़दीकियों, ओसामा बिन लादेन को पनाह देने और तालिबान की वापसी में भूमिका जैसे गंभीर आरोप क्यों न हों। वर्सानो का कहना है, “हम एक अत्यंत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में अपने वास्तविक मित्रों के प्रति शत्रुतापूर्ण रुख अपना रहे हैं, जहां हमें चीन के उदय का मुकाबला करने के लिए हर संभव सहायता की आवश्यकता है।”
भारत ने अब तक सार्वजनिक तौर पर संयम बनाए रखा है। लेकिन ट्रंप के शुल्क, पाकिस्तान की ओर उनके झुकाव और इसके पीछे की राजनीति निश्चित रूप से 21वीं सदी की सबसे अहम साझेदारी को जटिल बना सकते हैं। सवाल यह है कि क्या ट्रंप की यह नीति सिर्फ़ चुनावी राजनीति और घरेलू वोटबैंक को ध्यान में रखकर अपनाई गई है, या फिर यह वाकई एशियाई भू-राजनीति की नई दिशा की ओर इशारा कर रही है।
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