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Wednesday, June 17, 2026
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लोकमान्य तिलक ने कैसे बनाया गणेशोत्सव को महाराष्ट्र का विराट सामूहिक पर्व!

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कुछ ही दिनों में महाराष्ट्र की गलियों और चौकों में गणपति बप्पा मोरया के जयघोष गूंजेंगे। ढोल-ताशों की थाप के बीच 27 अगस्त से शुरू हो रहा गणेश चतुर्थी महोत्सव लाखों श्रद्धालुओं को एकजुट करेगा। आज यह त्योहार महाराष्ट्र की सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है, लेकिन यह हमेशा से ऐसा नहीं था। कभी यह पर्व केवल घरों तक सीमित, एक निजी धार्मिक अनुष्ठान हुआ करता था।

इस निजी पर्व को सार्वजनिक आंदोलन में बदलने का श्रेय जाता है लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (1856–1920) को। वर्ष 1893 में जब गुजरात के प्रभास पाटन और मुंबई में भीषण हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे, तब तिलक ने गणेश महोत्सव को सार्वजनिक स्वरूप देने का निर्णय लिया। इतिहासकार बताते हैं कि उस दौर में हिंदू समाज अक्सर मोहम्मदन मोहर्रम जुलूसों में भाग लेता था। तिलक ने लोगों की ऊर्जा को नई दिशा दी और उन्हें गणेशोत्सव के आयोजन में जोड़ा।

धनंजय कीर ने अपनी पुस्तक Lokamanya Tilak: Father of the Indian Freedom Struggle में लिखा है,
“हिंदू, जो अब तक मोहर्रम में शामिल होते थे, अब उन्होंने वह छोड़कर गणेश महोत्सव में अपनी शक्ति लगाई। तिलक की संगठन क्षमता और नेतृत्व ने इस निजी पर्व को सार्वजनिक उत्सव में बदल दिया। उन्होंने लोगों में सामूहिकता की भावना जगाई।”

गणेश महोत्सव के लिए जगह-जगह सार्वजनिक मंडल बने। युवा ढोल-ताशे, भजन मंडलियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जुटे। तिलक ने इस उत्सव को न सिर्फ धार्मिक गर्व का प्रतीक बनाया, बल्कि इसे औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना जगाने का माध्यम भी बना दिया।

इतिहासकार वैभव पुरंदरे अपनी जीवनी Tilak: The Empire’s Biggest Enemy में कहते हैं, “यह माना जाता है कि तिलक ने ‘सार्वजनिक गणेशोत्सव’ की शुरुआत लोगों को अपनी भारतीयता जताने और अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध संगठित करने के लिए की। हालांकि प्रारंभ में यह अधिकतर हिंदू अस्मिता का प्रदर्शन था, लेकिन आगे चलकर यह ब्रिटिश राज के खिलाफ जनजागरण का बड़ा मंच बन गया।”

तिलक ब्रिटिश नीतियों की कटु आलोचना करते थे। वे लिखते और कहते थे कि औपनिवेशिक शासन ने भारत की संपत्ति लूट ली, जनता को निर्धनता में धकेला और उनकी सांस्कृतिक अस्मिता को क्षति पहुंचाई। उनके लिए स्वतंत्रता की लड़ाई केवल राजनीतिक नहीं बल्कि न्याय और आत्मसम्मान का संघर्ष थी।

उनके ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा’ इस ऐतिहासिक नारे ने पूरे देश में स्वतंत्रता आंदोलन की नई अलख जगाई। आज महाराष्ट्र का यह सार्वजनिक गणेशोत्सव, जिसे हर वर्ष लाखों लोग श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं, वास्तव में तिलक की उस दूरदर्शिता और साहसिक नेतृत्व का परिणाम है जिसने एक निजी अनुष्ठान को सांस्कृतिक-राष्ट्रीय आंदोलन में बदल दिया।

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