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NACC ने अल-फ़लाह को भ्रामक मान्यता देने के लिए किया चिह्नित; यूनिवर्सिटी ने कहा ‘भूल हुई’!

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10 नवंबर को दिल्ली के लाल किले के बाहर हुए विस्फोट के बाद से जांच एजेंसियों के कठोर रडार पर आई अल-फ़लाह यूनिवर्सिटी अब राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) के एक नए नोटिस के कारण विवादों में घिर गई है। संस्थान पर आरोप है कि उसने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर पुराने और समाप्त हो चुके प्रत्यायन दावों को ऐसे प्रस्तुत किया मानो वे अभी भी मान्य हों।

NAAC की ओर से 12 नवंबर को जारी शो-कॉज़ नोटिस के बाद विश्वविद्यालय ने अपना जवाब भेजते हुए कहा कि यह पूरी स्थिति ओवरसाइट और तकनीकी त्रुटियों का परिणाम थी, न कि कोई जानबूझकर किया गया भ्रामक प्रयास। विश्वविद्यालय के अनुसार पुरानी सामग्री वेबसाइट के गहरे पन्नों में पड़ी हुई थी और इसे अपडेट करने में लापरवाही हुई, जिसे अब हटाया जा चुका है।

NAAC अधिकारियों के मुताबिक, अल-फ़लाह ने अपने जवाब में स्वीकार किया कि इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए 2013 का  ए ग्रेड और टीचर एजुकेशन स्कूल के लिए 2011 का प्रत्यायन, दोनों पांच साल की वैधता सीमा पार कर चुके थे। परिषद का कहना है कि इस तरह की प्रस्तुतियां छात्रों और हितधारकों को भ्रमित करती हैं और इसी वजह से वर्ष 2018 में भी चेतावनी जारी की गई थी कि प्रत्यायन से जुड़ी गलत जानकारी गंभीर कार्रवाई का आधार बन सकती है। अल-फ़लाह के मामले को देखते हुए NAAC ने करीब 25 अन्य शैक्षणिक संस्थानों को भी इसी तरह की नोटिस भेजी हैं, जिनकी वेबसाइटों पर पुराने या समाप्त ग्रेड गहरे पन्नों में छिपे पाए गए।

लेकिन अल-फ़लाह की मुश्किलें केवल वेबसाइट तक सीमित नहीं हैं। 18 नवंबर को प्रवर्तन निदेशालय ने अल-फ़लाह ग्रुप के चेयरमैन जव्वाद अहमद सिद्दीक़ी को मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में गिरफ्तार किया, जो कथित फर्जी प्रत्यायन और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा है। इससे पहले एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज भी अल-फ़लाह की सदस्यता रद्द कर चुकी है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन मामलों से खुद को अलग बताते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह चिकित्सक हो या कर्मचारी, संस्थान से केवल ऑफिशियल कैपेसिटी में जुड़ा था और उसके व्यक्तिगत कृत्यों के लिए विश्वविद्यालय जिम्मेदार नहीं है।

हालिया 1997 में धौज गांव में अल-फलाह स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के रूप में स्थापित, इस संस्थान को संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त हुआ और 2014 में हरियाणा सरकार द्वारा इसे विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया, तथा 2015 में धारा 2(एफ) के तहत बुनियादी यूजीसी मान्यता भी प्राप्त हुई। हालांकि, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने स्पष्ट किया है कि अल-फलाह ने कभी भी धारा 12(बी) के दर्जे के लिए आवेदन नहीं किया या इसे प्राप्त नहीं किया, जिससे यह कुछ केंद्रीय अनुदानों के लिए अयोग्य हो गया।

इसके बावजूद, विश्वविद्यालय ने केंद्र सरकार की अल्पसंख्यक-केंद्रित योजनाओं का भरपूर लाभ उठाया। 2016 में, अल-फ़लाह के छात्रों को MoMA की ओर से ₹10 करोड़ से ज़्यादा की छात्रवृत्तियाँ वितरित की गईं। इससे पहले 2015 में, लगभग 2,600 अल्पसंख्यक छात्रों के लिए ₹6 करोड़ आवंटित किए गए थे। विश्वविद्यालय को जम्मू-कश्मीर के छात्रों को छात्रवृत्ति देने के लिए AICTE से ₹1.10 करोड़ भी मिले। इसी प्रकार, वर्ष 2014 में, जिस वर्ष इसे एक निजी विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता मिली, 50 अल्पसंख्यक छात्रों को MoMA छात्रवृत्तियाँ प्राप्त हुईं।

लाल किला ब्लास्ट जांच में भी अल-फ़लाह के आसपास की गतिविधियों पर गहरी नजर बनी हुई है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग चार डॉक्टरों को पहले ही अपने रजिस्टर से हटा चुका है, जिन्हें यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया था और जिन पर आतंकी मॉड्यूल से जुड़े होने के आरोप हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने विश्वविद्यालय को शैक्षणिक, प्रशासनिक और कानूनी  तीनों मोर्चों पर दबाव में ला दिया है, जबकि एजेंसियां इसकी कार्यप्रणाली और कड़ियों की कई परतों की जांच जारी रखे हुए हैं।

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