देश में श्रम व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए 29 पुराने श्रम कानूनों को समेटकर चार व्यापक श्रम संहिताओं का क्रियान्वयन घोषित कर दिया है। शुक्रवार (२० नवंबर) को जारी सूचना में सरकार ने कहा कि दशकों पुराने और जटिल श्रम कानून अब एक सरल, पारदर्शी और एकरूप ढांचे में बदल दिए गए हैं, जिससे न केवल उद्योगों के लिए अनुपालन आसान होगा बल्कि कर्मचारियों को भी उनके अधिकार, सुरक्षा और सामाजिक कल्याण से जुड़े प्रावधान अधिक सुनिश्चित रूप में मिलेंगे।
मजदूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और व्यावसायिक सुरक्षा से संबंधित ये चार श्रम संहिताएं पूरे देश में समान रूप से लागू होंगी, जिससे राज्यों के बीच मौजूद परस्पर असमानताओं को समाप्त करने में मदद मिलेगी।
सरकार के अनुसार नई व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य श्रमिकों के हितों की रक्षा और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस को मजबूत करना है। सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक ग्रेच्युटी को लेकर है, जहां अब फिक्स्ड-टर्म कर्मचारी भी मात्र एक वर्ष की निरंतर सेवा के बाद इसका लाभ पाने के पात्र होंगे। पहले यह सीमा पांच वर्ष थी। इसके साथ ही वेतन की गणना में कुल पारिश्रमिक का 50 प्रतिशत हिस्सा अनिवार्य रूप से शामिल होगा, ताकि ग्रेच्युटी, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा लाभों की गणना में एकरूपता बनी रहे।
कार्य घंटों और ओवरटाइम से जुड़े नियम भी बदले गए हैं। नए प्रावधान के तहत कर्मचारियों को प्रतिदिन 8 से 12 घंटे तक काम कराया जा सकेगा, बशर्ते सप्ताह में कुल कामकाजी समय 48 घंटे से अधिक न हो। अतिरिक्त समय में काम कराने पर दोगुना वेतन देना अनिवार्य होगा। दूसरी ओर, ठेकेदारों को अब पूरे देश में काम करने के लिए पांच वर्ष की वैधता वाला एक ही लाइसेंस पर्याप्त होगा, जिससे उनके लिए अनुपालन प्रक्रिया सरल हो जाएगी।
औद्योगिक संबंध संहिता में छंटनी से संबंधित प्रावधानों को भी संशोधित किया गया है। अब 299 कर्मचारियों तक वाले प्रतिष्ठानों को सरकार की पूर्व अनुमति के बिना छंटनी करने की छूट मिलेगी, जबकि पहले यह सीमा 100 कर्मचारियों की थी। सरकार का मानना है कि इससे बड़े पैमाने पर रोजगार का औपचारिकरण होगा और उद्योगों का विस्तार आसान बनेगा।
गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स, जो अब तक औपचारिक श्रम ढांचे से बाहर रहते थे, पहली बार इन संहिताओं के दायरे में लाए गए हैं। उनके लिए सामाजिक सुरक्षा निधि का प्रावधान किया गया है, जिससे जीवन, स्वास्थ्य, विकलांगता और वृद्धावस्था से जुड़ी योजनाओं का लाभ उन्हें भी मिल सकेगा। सेवा क्षेत्र में कार्यस्थल की लचीलेपन को बढ़ाते हुए वर्क-फ्रॉम-होम को भी संहिताओं में विधिक मान्यता दी गई है, जो कोविड-19 के बाद कार्य संस्कृति में आए बदलाव का औपचारिक प्रतिबिंब है।
न्यूनतम मजदूरी के प्रावधानों को लेकर भी बड़ा बदलाव किया गया है। अब संगठित और असंगठित, दोनों क्षेत्रों के सभी श्रमिकों को सरकार द्वारा तय न्यूनतम वेतन का अधिकार होगा। इसके साथ ही केंद्र द्वारा तय की जाने वाली फ्लोर वेज से नीचे कोई भी राज्य वेतन निर्धारित नहीं कर सकेगा। वेतन की परिभाषा को भी संशोधित करते हुए बेसिक पे, महंगाई भत्ता और रिटेनिंग अलाउंस को इसमें शामिल किया गया है, ताकि मनमाने कटौतियों की गुंजाइश न बचे।
लिंग समानता और महिलाओं की सुरक्षा को मजबूत करते हुए समान काम के लिए समान वेतन का आश्वासन दोहराया गया है और महिलाओं को सुरक्षा प्रावधानों के साथ नाइट शिफ्ट में काम करने की अनुमति दी गई है। इसके अलावा असंगठित क्षेत्र की महिला श्रमिकों को भी 26 सप्ताह की मातृत्व अवकाश का लाभ मिलेगा। सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत संगठित-असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म सभी श्रमिकों को जीवन, स्वास्थ्य और प्रोविडेंट फंड जैसी सुविधाओं का अधिकार सुनिश्चित किया गया है।
नए श्रम संहिता प्रवासी श्रमिकों को भी विशेष लाभ प्रदान करती हैं। अंतर-राज्यीय प्रवासी श्रमिकों को अब साल में एक बार अपने गृह राज्य की यात्रा के लिए भत्ता मिलेगा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पोर्टेबिलिटी उपलब्ध होगी और राज्यों में एकसमान सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं मिलेंगी। सरकार का दावा है कि ये बदलाव भारतीय श्रम बाजार को अधिक न्यायपूर्ण, सुरक्षित और आधुनिक स्वरूप देंगे और लंबे समय से लंबित व्यापक श्रम सुधारों को एक निर्णायक रूप प्रदान करेंगे।
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