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अमेरिका की मांग पर गाज़ा में पाकिस्तानी सैनिक उतारना मुनीर के लिए बड़ी चुनौती

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पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर इस समय एक कठिन दुविधा में फंसे नजर आ रहे हैं। एक तरफ अमेरिका है, जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप गाज़ा के पुनर्निर्माण और स्थिरीकरण के लिए मुस्लिम देशों की एक अंतरराष्ट्रीय सैन्य टुकड़ी में पाकिस्तान की भागीदारी चाहते हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान का घरेलू राजनीतिक और सामाजिक माहौल है, जहां इज़राइल और गाज़ा युद्ध को लेकर तीव्र भावनाएं मौजूद हैं। ऐसे में मुनीर के लिए कोई भी फैसला आसान नहीं माना जा रहा।

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब असीम मुनीर छह महीने से भी कम अवधि में तीसरी बार वॉशिंगटन जाने की तैयारी कर रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा पेश की गई 20-सूत्रीय गाज़ा शांति योजना को संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी मिल चुकी है। इसी योजना के तहत गाज़ा में एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स – ISF) तैनात करने की परिकल्पना की गई है।

ट्रंप की 20-सूत्रीय योजना के अनुसार, गाज़ा में युद्ध के बाद संक्रमणकाल के दौरान पुनर्निर्माण और आर्थिक पुनर्बहाली की निगरानी के लिए मुस्लिम देशों की सेनाओं को तैनात किया जाना है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका इस बल का नेतृत्व करने के लिए एक दो-स्टार अमेरिकी जनरल की नियुक्ति करेगा, जबकि इज़राइल में इसका मुख्यालय स्थापित किया गया है। हालांकि, व्हाइट हाउस का कहना है कि अमेरिका ज़मीनी स्तर पर अपने सैनिक नहीं भेजेगा।

इस पहल पर चर्चा के लिए कतर में हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें पाकिस्तान, मिस्र, इंडोनेशिया, कतर, जॉर्डन, यूएई, इटली, फ्रांस, ब्रिटेन और अज़रबैजान जैसे देशों को आमंत्रित किया गया। हालांकि, हमास समर्थक माने जाने वाले तुर्किये को इस बैठक में शामिल नहीं किया गया। कई मुस्लिम देशों को आशंका है कि गाज़ा में तैनाती उन्हें हमास के साथ सीधे टकराव में खींच सकती है।

पाकिस्तान ने कभी इज़राइल को मान्यता नहीं दी है और 1948 से ही वह फिलिस्तीनी पक्ष का समर्थन करता आया है। पाकिस्तान के पासपोर्ट पर आज भी स्पष्ट रूप से लिखा होता है कि यह इज़राइल यात्रा के लिए मान्य नहीं है। इस्लामाबाद इज़राइल को भारत का करीबी रणनीतिक साझेदार मानता है और इसी कारण उसने यूएई, बहरीन या मोरक्को की तरह अब्राहम समझौते का हिस्सा बनने से भी इनकार किया।

अक्टूबर 2023 में गाज़ा युद्ध शुरू होने के बाद पाकिस्तान में इज़राइल-विरोधी भावनाएं और तीव्र हो गईं। पाकिस्तान सरकार ने गाज़ा की घटनाओं को नरसंहार बताया, इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को आतंकवादी कहा और उन पर युद्ध अपराधों का आरोप लगाया दावे जिन्हें इज़राइल ने खारिज किया है।

पाकिस्तान में कई इस्लामी दल और संगठन ऐसे हैं जिनके पास बड़ी संख्या में समर्थक और सड़क पर उतरने की ताकत है। हाल ही में एक प्रभावशाली इस्लामी संगठन पर प्रतिबंध लगाया गया, उसके नेताओं को गिरफ्तार किया गया और संपत्तियां जब्त की गईं, लेकिन अधिकारियों के अनुसार उसकी विचारधारा अब भी जीवित है।

इसके अलावा, जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी के समर्थकों का भी सेना प्रमुख मुनीर से टकराव का इतिहास रहा है। ऐसे में गाज़ा में पाकिस्तानी सैनिक भेजने का फैसला व्यापक विरोध और अस्थिरता को जन्म दे सकता है।

सेना प्रमुख बनने के बाद से असीम मुनीर ने खुद को एक धर्मनिष्ठ मुस्लिम और इस्लाम के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया है। ऐसे में गाज़ा में सैनिक भेजने का फैसला कई लोगों की नजर में “विश्वासघात” के तौर पर देखा जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पहले से तनावग्रस्त जनभावनाएं भड़क सकती हैं।

वॉशिंगटन स्थित अटलांटिक काउंसिल के वरिष्ठ फेलो माइकल कुगेलमैन के अनुसार, “गाज़ा स्थिरीकरण बल में योगदान न देना ट्रंप को नाराज़ कर सकता है, और यह उस पाकिस्तानी राज्य के लिए छोटी बात नहीं है, जो अमेरिकी निवेश और सुरक्षा सहायता हासिल करने के लिए उनके करीबी बने रहना चाहता है।”

रक्षा विश्लेषक आयशा सिद्दीका का कहना है कि पाकिस्तान की सैन्य क्षमता के चलते मुनीर पर दबाव है कि वह अपनी “क्षमता” का इस्तेमाल करें। वहीं, सिंगापुर स्थित एस. राजरत्नम स्कूल के वरिष्ठ फेलो अब्दुल बासित ने चेतावनी दी कि यदि गाज़ा में हालात बिगड़े, तो लोग कहेंगे कि “असीम मुनीर इज़राइल के इशारे पर काम कर रहे हैं।”

पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने हाल में कहा था कि पाकिस्तान शांति स्थापना के लिए सैनिक भेजने पर विचार कर सकता है, लेकिन हमास को निरस्त्र करना “हमारा काम नहीं” है। इससे साफ है कि इस मुद्दे पर पाकिस्तान खुद भी स्पष्ट रुख नहीं बना पाया है। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि मुनीर को कम आंकना भी भूल होगी। हाल के महीनों में उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप के साथ करीबी संबंध बनाए हैं और जून में उन्हें व्हाइट हाउस में विशेष लंच के लिए आमंत्रित किया गया था। हाल ही में उन्हें 2030 तक सेवा विस्तार मिला है और संवैधानिक संशोधनों के जरिए उन्हें आजीवन कानूनी संरक्षण भी प्रदान किया गया है।

कुगेलमैन के शब्दों में, “पाकिस्तान में बहुत कम लोग ऐसे हैं, जिनके पास जोखिम लेने की उतनी आज़ादी है जितनी मुनीर के पास है। अंततः, फैसला मुनीर का होगा और उनके नियमों पर ही चलेगा।” दुनिया का एकमात्र मुस्लिम परमाणु संपन्न देश होने के नाते पाकिस्तान की सेना अनुभवी और युद्ध-परखी मानी जाती है। लेकिन गाज़ा में संभावित तैनाती ने असीम मुनीर को ऐसे ‘कैच-22’ में डाल दिया है, जहां हर रास्ते पर राजनीतिक, कूटनीतिक और घरेलू जोखिम मौजूद हैं।

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