ऑस्कर विजेता संगीतकार ए आर रहमान के बॉलीवुड में काम कम मिलने से जुड़े हालिया बयान ने नई बहस को जन्म दे दिया है। BBC एशियन नेटवर्क को दिए एक इंटरव्यू में रहमान ने कहा कि पिछले आठ वर्षों में उनके हिंदी फिल्म करियर में आई सुस्ती के पीछे “पावर शिफ्ट” एक कारण हो सकता है और यह भी कि “यह कोई कम्युनल चीज़ भी हो सकती है, लेकिन मेरे सामने खुलकर नहीं है।” इस टिप्पणी के बाद उनके दावे पर सवाल उठाते हुए कई आलोचकों ने इसे आधारहीन करार दिया है।
इंटरव्यू में रहमान ने कहा कि,”हो सकता है कि मुझे इन सब बातों की जानकारी न हो। हो सकता है कि भगवान ने ये सब बातें मुझसे छिपा रखी हों। लेकिन मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ, पर शायद पिछले आठ सालों में, क्योंकि सत्ता में बदलाव आया है। अब जो लोग रचनात्मक नहीं हैं, उनके पास फैसले लेने की शक्ति है, और यह शायद एक सामूहिक मामला भी रहा हो, लेकिन सीधे तौर पर नहीं। मुझे कानाफूसी की तरह पता चलता है कि उन्होंने आपको बुक किया था, लेकिन संगीत कंपनी ने अपने पांच संगीतकारों को काम पर रख लिया। मैंने कहा, ‘वाह, बढ़िया है, अब मुझे आराम करने का समय मिल गया है, मैं अपने परिवार के साथ सुकून से समय बिता सकता हूं।”
This is why these converts are more dangerous than the originals. But they are shameless and greedy enough to work on projects that they fundamentally hate. pic.twitter.com/sL7Epuo3gr
— Keh Ke Peheno (@coolfunnytshirt) January 17, 2026
आलोचकों का यह भी कहना है कि आज भी कई मुस्लिम गायक और संगीतकार, जैसे फ़हीम अब्दुल्ला, सलीम–सुलेमान, अरमान और अमाल मलिक, जावेद अली लगातार काम कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठाया जा रहा है कि अगर कोई “कम्युनल फैक्टर” है, तो वह केवल ए आर रहमान तक ही सीमित क्यों दिखाई देता है।
रहमान का करियर तीन दशकों से अधिक का रहा है और उन्होंने तमिल, हिंदी सहित कई भाषाओं में सैकड़ों फ़िल्मों में संगीत दिया है। हाल ही में आई बॉलीवुड की हिट फिल्म में, जिसमें मुख्य रूप से तमिल फिल्मों में अभिनय करने वाले धनुष ने अभिनय किया था, उनके गाने काफी लोकप्रिय हुए। दरअसल, गायक फहीम अब्दुल्ला का गाना ‘आवारा अंगारा’ दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। 2025 की एक और ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘सैयारा’ का टाइटल ट्रैक भी चार महीने तक टॉप गानों में शामिल रहा।
यह कैसे संभव है कि फहीम अब्दुल्ला, सलीम-सुलेमान, अरमान और अमाल मलिक, जावेद अली जैसे मुस्लिम अभिनेता, गायक और संगीतकार बॉलीवुड में लगातार काम पाते रहें, लेकिन ‘सांप्रदायिक मुद्दे’ के कारण एआर रहमान को पर्याप्त काम न मिले? क्या हिंदी फिल्म और संगीत उद्योग में ‘सांप्रदायिक मुद्दा’ सिर्फ एआर रहमान के खिलाफ ही है?
जब तक रहमान उन ‘गैर-रचनात्मक निर्णय निर्माताओं’ के बारे में और अधिक जानकारी नहीं देते, तब तक उनका बॉलीवुड के “सांप्रदायिक” होने का दावा निराधार है। इसे आए दिन अनावश्यक तौर पर मुस्लिम पीड़ित के प्रोपोगेंडा के स्वरुप देखा जाना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि स्थापित कलाकारों द्वारा अपने करियर में आई गिरावट का कारण ‘गिरोहों’ और ‘बहिष्कार’ को बताना कोई नई बात नहीं है। तापसी पन्नू हों, स्वरा भास्कर हों या ऋचा चड्ढा, सभी राजनीतिक मुद्दों पर मुखर रही हैं। उन्हें राजनीतिक स्पेक्ट्रम के विभिन्न पक्षों से समर्थन और आलोचना दोनों मिली हैं। फिर भी जब उनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं करतीं, तो वे कभी-कभी तर्क देती हैं कि उनकी असफलता उनकी बेबाक राजनीतिक टिप्पणी की कीमत है
यह सुविधाजनक लेकिन बेईमानी भरा बहाना तब सामने आता है जब उनकी फिल्में खराब पटकथा, औसत दर्जे के अभिनय और अन्य विषयवस्तु संबंधी कारणों से दर्शकों द्वारा नकार दी गई थीं।
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