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पाकिस्तान और IMF का ‘रिश्ता क्या कहलाता है’, ‘लव एंड हेट’ से टेंशन में ‘आतंकिस्तान’

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पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ एक अजीब ‘लव एंड हेट’ रिश्ते में फंसा नजर आ रहा है। एक ओर गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा यह देश आईएमएफ से मिलने वाले कर्ज के सहारे किसी तरह अपनी अर्थव्यवस्था को संभाले हुए है, वहीं दूसरी ओर उसके मीडिया और राजनीतिक हलकों में उसी बहुपक्षीय संस्था की तीखी आलोचना हो रही है।

जहां सरकार लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए आईएमएफ से कर्ज को जीवनरेखा मान रही है, वहीं देश के पूर्व मंत्री और विश्लेषक पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली के लिए आईएमएफ को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

पाकिस्तान के अखबार द न्यूज इंटरनेशनल में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है, “आईएमएफ के साथ पाकिस्तान का लंबा जुड़ाव एक तरह के व्यवस्थित विनाश का पैटर्न बन गया है। स्थिरीकरण, राजकोषीय सख्ती और ‘सुधारों’ के नाम पर ऐसी नीतियां थोपी गईं, जिनसे ऊर्जा लागत में भारी वृद्धि हुई, अत्यधिक प्रतिगामी कर लगाए गए, औद्योगिक उत्पादन ठप हो गया, गरीबी बढ़ी और अर्थव्यवस्था को गैर-औद्योगिकीकरण की ओर धकेल दिया गया।”

लेख में कहा गया है कि पाकिस्तान की सामाजिक-आर्थिक विकास रणनीति का केंद्र शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार को मजबूत करना होना चाहिए था, ताकि देश कम मूल्य वाली प्राकृतिक संसाधन आधारित अर्थव्यवस्था से निकलकर उच्च मूल्यवर्धित, प्रौद्योगिकी आधारित ज्ञान अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ सके।

हालांकि, लेख का दावा है कि इसके ठीक उलट हुआ है, जिससे अब एक गंभीर अस्तित्वगत संकट खड़ा हो गया है। इसमें कहा गया है कि स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय बदहाल स्थिति में हैं, निर्यात 35 अरब डॉलर के शिखर से गिरकर लगभग 30 अरब डॉलर पर आ गया है, गरीबी में भारी इजाफा हुआ है, और प्रतिभाशाली युवाओं व औद्योगिक समूहों का बड़े पैमाने पर विदेश पलायन हुआ है।

लेख के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में पाकिस्तान के औद्योगिक परिदृश्य में तेज गिरावट आई है। ऊर्जा की बढ़ती लागत, भारी कर बोझ और नीतिगत अनिश्चितता के चलते सैकड़ों स्थानीय विनिर्माण इकाइयां बंद हो गई हैं। उद्योग जगत के नेताओं का दावा है कि प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में 50 प्रतिशत से अधिक फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं।

क्षेत्रीय आंकड़े भी इसी तरह के रुझान दिखाते हैं। खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में ही लगभग छह वर्षों में करीब 795 औद्योगिक इकाइयां बंद हो चुकी हैं, जिनमें से बड़ी संख्या पिछले पांच वर्षों में ऊंची उपयोगिता लागत और घटते निवेश विश्वास के कारण बंद हुई है।

पाकिस्तान के पारंपरिक निर्यात इंजन माने जाने वाले वस्त्र उद्योग को भी भारी नुकसान पहुंचा है। उद्योग सूत्रों का अनुमान है कि देशभर में कम से कम 144 टेक्सटाइल मिलें बंद हो चुकी हैं, जबकि गारमेंट सेक्टर में बड़े पैमाने पर इकाइयों के बंद होने से हजारों नौकरियां खत्म हो गई हैं और निर्यात प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ गई है।

लेख में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान से कॉरपोरेट पलायन की लहर में माइक्रोसॉफ्ट जैसे वैश्विक नाम शामिल हैं, जिसने 25 साल बाद देश में अपना परिचालन पूरी तरह बंद करने का फैसला किया है। इसके अलावा, करीम, शेल, टेलीनॉर, और प्रॉक्टर एंड गैम्बल जैसी कंपनियां या तो पाकिस्तान से बाहर निकल रही हैं या फिर अपनी मौजूदगी घटा रही हैं।

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