30.8 C
Mumbai
Thursday, June 11, 2026
होमदेश दुनियाअंग्रेजी हुकूमत की नौकरी ठुकरा नेताजी ने चुना देश, आजाद हिंद फौज...

अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी ठुकरा नेताजी ने चुना देश, आजाद हिंद फौज से लिखी नई कहानी!

बोस ने अपने जीवन में कई ऐसे साहसिक कदम उठाए जो आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनके 'पराक्रम' की शुरुआत तब दिखाई दी जब उन्होंने देश के लिए अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी ठुकरा दी।

Google News Follow

Related

आज के समय में ज्यादातर लोग सरकारी नौकरी को अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी सफलता मानते हैं। कई साल मेहनत करते हैं, पढ़ाई करते हैं, सपने संजोते हैं और फिर कुछ ही उसे हकीकत होता देख पाते हैं। लेकिन सोचिए, कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने इस प्रतिष्ठित और सुरक्षित रास्ते को छोड़कर अपनी माटी, अपने देश और उसकी आजादी को चुना। ऐसे ही महान पराक्रमी व्यक्तियों में एक थे सुभाष चंद्र बोस, जिन्होंने अपने कर्मों और निर्णयों से इतिहास रच दिया।

सुभाष चंद्र बोस एक भारतीय राष्ट्रवादी नेता थे, जिनका नाम आज हर भारतीय गर्व के साथ लेता है। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत की आजादी की लड़ाई में जिस तरह की भूमिका निभाई, वह अद्भुत थी। बोस ने अपने जीवन में कई ऐसे साहसिक कदम उठाए जो आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

उनके ‘पराक्रम’ की शुरुआत तब दिखाई दी जब उन्होंने देश के लिए अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी ठुकरा दी। यह कोई मामूली फैसला नहीं था। उस समय आईसीएस (अब आईएएस) जैसी प्रतिष्ठित नौकरी को छोड़कर उन्होंने अपनी पूरी ताकत आजादी के लिए लगा दी।

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक में हुआ था। बचपन से ही उनमें जिज्ञासा और सीखने की लगन दिखाई देती थी। शुरुआती पढ़ाई के बाद उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से डिग्री हासिल की। पढ़ाई में तेज होने के बावजूद उनका लक्ष्य सिर्फ व्यक्तिगत सफलता नहीं था, बल्कि देश की भलाई और आजादी थी, इसलिए आगे चलकर वह आईसीएस की परीक्षा देने इंग्लैंड चले गए। वर्ष 1919-20 में उन्होंने यह परीक्षा पास की और चौथे स्थान के साथ आईसीएस अधिकारी बन गए।

लेकिन, बोस के लिए यह नौकरी सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी। उनके दिल और दिमाग में हमेशा एक बात रही: भारत को स्वतंत्र देखना, इसलिए उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की प्रतिष्ठित नौकरी को ठुकरा दिया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए। कांग्रेस में शामिल होकर बोस तेजी से नेतृत्व की ओर बढ़े।

उनके क्रांतिकारी विचार और ब्रिटिश शासन से पूरी आजादी की वकालत उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती थी। वर्ष 1938 और 1939 में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष भी चुना गया, लेकिन बाद में उन्होंने अपने विचारों और रणनीति के चलते इस्तीफा दे दिया।

देश को आजाद कराने के लिए बोस ने अपनी सेना ‘आजाद हिंद फौज’ बनाई। यह सिर्फ एक सेना नहीं थी, बल्कि उनके नेतृत्व, साहस और अनुशासन की मिसाल थी। आजाद हिंद फौज ने भारतीय जवानों को केवल लड़ने के लिए नहीं, बल्कि देशभक्ति, संगठन और साहस के लिए प्रशिक्षित किया। बोस ने सिर्फ देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाया। उन्होंने बर्लिन में फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना की और आजाद हिंद रेडियो शुरू किया, जिससे आजादी का संदेश जन-जन तक पहुंचा।

नेताजी का नारा, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा,” आज भी हर भारतीय के दिल में गूंजता है। यह नारा सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि संकल्प और हिम्मत का प्रतीक है। यही वजह है कि भारत सरकार ने 2021 से हर साल 23 जनवरी को उनकी जयंती पर पराक्रम दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। यह दिन सिर्फ नेताजी की याद दिलाने के लिए नहीं है, बल्कि उनके विचारों, साहस और दृढ़ संकल्प को जीवित रखने का प्रतीक है।

यह भी पढ़ें-

राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति ने जम्मू-कश्मीर के डोडा में हुए सड़क हादसे पर जताया दुख!

National Stock Exchange

लेखक से अधिक

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

Star Housing Finance Limited

हमें फॉलो करें

151,388फैंसलाइक करें
526फॉलोवरफॉलो करें
313,000सब्सक्राइबर्ससब्सक्राइब करें

अन्य लेटेस्ट खबरें