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15 मिनट में उतारे गए, बने शास्त्रीय संगीत की पहचान! 

उस्ताद अमीर खां का जन्म 15 अगस्त 1912 को मध्य प्रदेश के इंदौर में एक संगीत परिवार में हुआ था। उनके पिता शाहमीर खां सारंगी वादक थे और इंदौर के होलकर राजदरबार से जुड़े थे।

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हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में उस्ताद अमीर खां का नाम हमेशा अमर रहेगा। देश उन्हें 13 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि पर याद कर रहा है। कभी एक दौर ऐसा था, जब कुछ लोगों की नासमझी के कारण उन्हें मंच से उतार दिया गया था, लेकिन उन्होंने समय को अपना हथियार बनाया और खुद को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सबसे मजबूत कड़ी साबित किया।

उस्ताद अमीर खां का जन्म 15 अगस्त 1912 को मध्य प्रदेश के इंदौर में एक संगीत परिवार में हुआ था। उनके पिता शाहमीर खां सारंगी वादक थे और इंदौर के होलकर राजदरबार से जुड़े थे। उनके दादा चंगे खां बहादुर शाह जफर के दरबार में गायक रह चुके थे। बचपन से ही अमीर खां सुरों के माहौल में पले-बढ़े, लेकिन नौ वर्ष की उम्र में मां के निधन ने उन्हें भीतर से संवेदनशील बना दिया।

शुरुआत में पिता ने उन्हें सारंगी सिखाई, लेकिन उनका झुकाव गायन की ओर रहा। इसके बाद उन्हें गायन की गहरी तालीम दी गई। उन्होंने तबला भी सीखा, जिससे उनकी लय की समझ मजबूत हुई। घर पर जमी महफिलों में देश के बड़े संगीतकार आते-जाते रहते थे। इसी माहौल ने अमीर खां की गायकी को अलग दिशा दी।

1934 में वे बंबई पहुंचे और मंच पर गाना शुरू किया, लेकिन शुरुआती समय उनके लिए बेहद कठिन रहा। उनकी गायकी धीमी, गंभीर और ठहरी हुई थी, जिसे आम श्रोता तुरंत समझ नहीं पाते थे। एक संगीत सम्मेलन में आयोजकों ने उन्हें केवल 15 मिनट बाद ही गाना बंद करने को कह दिया। श्रोताओं ने उनसे ठुमरी गाने का सुझाव दिया, लेकिन अमीर खां ने इनकार कर दिया। उनके लिए संगीत से समझौता करना संभव नहीं था।

ख्याल और ध्रुपद की परंपराओं को मिलाकर उन्होंने अपनी अलग शैली बनाई, जो आगे चलकर इंदौर घराने के नाम से पहचानी गई। उनकी गायकी को अंतर्मुखी कहा गया। वे मंच पर दिखावे से दूर रहते थे और सुरों को धीरे-धीरे खोलते थे।

हालांकि, वे शास्त्रीय संगीत के कट्टर अनुयायी थे, फिर भी उन्होंने फिल्मों में गाकर शास्त्रीय संगीत को आम लोगों तक पहुंचाया। ‘बैजू बावरा’, ‘शबाब’, ‘झनक झनक पायल बाजे’ और ‘गूंज उठी शहनाई’ जैसी फिल्मों में उनके गाए गीत आज भी याद किए जाते हैं। इन फिल्मों ने शास्त्रीय संगीत को घर-घर तक पहुंचाया।

उस्ताद अमीर खां को उनके योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, राष्ट्रपति पुरस्कार और पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 13 फरवरी 1974 को कोलकाता में एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया।

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