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Tuesday, October 20, 2026
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पशुपति सील विवाद पर साधु-संत नाराज, अमेरिका से माफी की मांग!

इसी तरह, एक बार फिर वह भारत की छवि को धूमिल करने और यहां की संस्कृति व परंपराओं पर कलंक लगाने के लिए गलत दुष्प्रचार करने की कोशिश कर रहा है।

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हड़प्पाकालीन 4300 वर्ष पुरानी ‘पशुपति सील’ पर अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के की ओर से सवाल उठाए जाने पर अयोध्या के साधु-संतों ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि कोई भी देश इस तरह दूसरे देश के खिलाफ भ्रामक प्रचार नहीं कर सकता है। अमेरिका को माफी मांगनी चाहिए।

महंत देवेशाचार्य महाराज ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा, “अमेरिका के नेताओं और लोगों का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। हाल ही में, आपने देखा होगा कि अमेरिका ने भारत के ब्राह्मणों और स्वयं भारत के बारे में कुछ टिप्पणियां की थीं।

इसी तरह, एक बार फिर वह भारत की छवि को धूमिल करने और यहां की संस्कृति व परंपराओं पर कलंक लगाने के लिए गलत दुष्प्रचार करने की कोशिश कर रहा है। यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। हम सभी इसका विरोध करते हैं।”

उन्होंने कहा कि कोई भी देश इस तरह दूसरे देश के खिलाफ भ्रामक प्रचार नहीं कर सकता है। अमेरिका को इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के के कृत्य को लेकर माफी मांगनी चाहिए।

अयोध्या धाम के महंत सीताराम दास ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के का बयान अत्यंत निंदनीय है। अगर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां ​​भारत के इतिहास को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगी, तो इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यहां तक ​​कि उनका अपना इतिहास भी भारतीय सनातन संस्कृति से जुड़ा हुआ है।”

उन्होंने कहा कि यह ‘पशुपति सील’ ही है, इसमें कोई संदेह नहीं है। जिसका सनातन संस्कृति का कतई ज्ञान नहीं है, वह इसके बारे में क्या बता सकता है। विदेशी ताकतें सनातन संस्कृति के खिलाफ कुचक्र रच रही हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति और सनातन को कोई नहीं मिटा सकता है।

आर्य संत वरुण दास जी महाराज ने अपने बयान में कहा कि यह (ऑड्रे ट्रुश्के का दावा) पूरी तरह से भ्रामक और नकारात्मक है। किसी भी तरह से भ्रम पैदा करना विदेशियों का काम है। जो सील मिली है, वह लगभग 4300 साल पुरानी है। भगवान शिव को पहले से ही पशुपति के रूप में संबोधित किया जाता रहा है। नेपाल में भगवान शिव आज भी पशुपति के रूप में विराजमान हैं। उनका वाहन बैल (नंदी) है।

उन्होंने कहा, “ऑड्रे ट्रुश्के का यह कहना है कि सील प्रोटो-एलामाइट सभ्यता का है, यह बिल्कुल गलत और भ्रामक है। क्योंकि यह सभ्यता 2700 ईसा पूर्व से 3200 ईसा पूर्व के बीच की है, जबकि ‘पशुपति सील’ 4300 साल पुरानी है। यानी इसमें एक हजार साल से अधिक का अंतर है।”

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