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गुर्दे की सेहत के लिए वरदान हैं ये योगाभ्यास, जानें करने का सही तरीका! 

सही योगाभ्यासों, प्राणायाम और सजगता के माध्यम से हम न केवल अपने गुर्दों को स्वस्थ रख सकते हैं बल्कि भविष्य में होने वाले गंभीर जोखिमों से भी इनका बचाव कर सकते हैं।

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स्वास्थ्य का वास्तविक अर्थ केवल बीमारियों का इलाज करना नहीं बल्कि शरीर को स्वाभाविक रूप से स्वस्थ और मजबूत बनाए रखना है। गुर्दे हमारे शरीर का प्राकृतिक फिल्टरिंग सिस्टम है, जो शरीर की सफाई में काम करता है। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं बल्कि आंतरिक अंगों की मालिश और पुनर्प्राप्ति की एक सूक्ष्म तकनीक है।

सही योगाभ्यासों, प्राणायाम और सजगता के माध्यम से हम न केवल अपने गुर्दों को स्वस्थ रख सकते हैं बल्कि भविष्य में होने वाले गंभीर जोखिमों से भी इनका बचाव कर सकते हैं।

मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान ने कुछ ऐसे आसनों के बारे में बताया, जो गुर्दे पर प्रभाव डालते हैं और उसकी कार्यप्रणाली को मजबूत बनाते हैं। इनमें उत्तानपदासन, सेतुबंधासन, धनुरासन, भुजंगासन, अर्ध मत्स्येन्द्रासन, वक्रासन, कटिचक्रासन, त्रिकोणासन जैसे कई योगाभ्सास शामिल हैं।

उत्तानपदासन : यह आसन सीधे तौर पर गुर्दे की किसी बीमारी को ठीक नहीं करता लेकिन यह शरीर की आंतरिक प्रणालियों को मजबूत कर गुर्दे की कार्यक्षमता में सुधार लाता है। आयुष मंत्रालय के अनुसार, इस आसन को करने के दौरान जब साधक पैरों को ऊपर उठाते हैं, तो निचले हिस्से से रक्त का प्रवाह पेट और पीठ के निचले हिस्से (जहां गुर्दे स्थित होते हैं) की ओर बढ़ता है। बेहतर ब्लड सर्कुलेशन से गुर्दे को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है और वह खून को बेहतर ढंग से फिल्टर कर पाता है।

सेतुबंधासन: इस योगासन को करने से पेट के भीतरी अंगों के साथ-साथ गुर्दे को भी उत्तेजित (स्टिम्युलेट) करता है। इस अभ्यास से पेल्विक क्षेत्र और किडनी के आसपास रक्त का संचार सुचारू होता है, जिससे अंगों को पोषण मिलता है। साथ ही, यह हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में अहम भूमिका अदा करता है।

धनुरासन: धनुरासन के अभ्यास के दौरान पेट और कमर के हिस्से में खिंचाव होता है, जिससे गुर्दे सहित अंदरूनी अंगों में रक्त का संचार बेहतर होता है। यह आसन अंगों को उत्तेजित करके शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने और मूत्र विकारों को दूर करने में मददगार माना जाता है।

वक्रासन: अग्न्याशय को उत्तेजित करता है जिससे इंसुलिन का स्राव बेहतर होता है। वक्रासन में शरीर को मोड़ने से पेट के निचले हिस्से और कमर की मांसपेशियों पर हल्का दबाव पड़ता है, जिससे किडनी क्षेत्र में रक्त संचार बेहतर होता है।

भुजंगासन : नियमित तौर पर इस आसन को करने से रीढ़ की हड्डी मजबूत और लचीली बनती है। पेट के अंगों पर दबाव डालकर पाचन क्रिया में सुधार करता है। आसन करने से पेट में खिंचाव होता है, जिससे किडनी जैसे आंतरिक अंगों की हल्की मालिश होती है, जिससे उनका कामकाज सुधरता है।

अर्ध मत्स्येन्द्रासन: यह पेट के अंगों की अच्छी मालिश करता है और रक्त संचार बढ़ाता है।

कटिचक्रासन: कटिचक्रासन के दौरान होने वाले ट्विस्टिंग (घुमाव) मूवमेंट से पेट और कमर के अंदरूनी अंगों जैसे किडनी और लीवर की हल्की मालिश होती है। इस आसन से रीढ़ और पेट के हिस्से में रक्त का संचार बढ़ता है, जिससे गुर्दे को बेहतर ऑक्सीजन और पोषण मिलने में मदद मिलती है।

त्रिकोणासन: इस आसन को करने के दौरान शरीर के एक तरफ का हिस्सा सिकुड़ता है और दूसरी तरफ खिंचाव होता है, जिससे किडनी और लिवर जैसे अंगों तक रक्त का संचार बेहतर होता है।

यह आसन करने से शरीर को कई तरह के लाभ मिल सकते हैं। हालांकि, यह सीधे तौर पर किसी गंभीर किडनी रोग का इलाज नहीं है, लेकिन स्वस्थ जीवनशैली के तहत इसे करने से पेट के अंगों की कार्यप्रणाली सक्रिय रहती है।

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