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साल 2023 में 10 राज्यों का विधानसभा चुनाव तय करेगा बीजेपी का भविष्य

साल 2023 कांग्रेस और भाजपा विरोधी तमाम क्षेत्रीय दलों के लिए करो या मरो के संघर्ष से भरा हुआ।

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नाव वर्ष के तौर पर साल 2023 का आगमन हो चुका है। साल 2023 सियासी सरगर्मियों और चुनावों के नाम होगा। इस वर्ष देश के क़रीब दस राज्यों में चुनाव हो सकते हैं। 2024 के शुरू में ही लोकसभा चुनाव होने हैं इसलिए 2023 को लोकसभा का चुनावी वर्ष भी मान सकते हैं। दिसंबर में आये गुजरात चुनाव के नतीजों में बीजेपी को ऐतिहासिक जीत हासिल हुई। गुजरात में मिली इस बंपर जीत के साथ ही बीजेपी ने आगामी लोकसभा चुनाव को जितने का दावा करना शुरू कर दिया है। लेकिन इसके पहले 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को शानदार प्रदर्शन करना होगा। साल 2023 में 9 राज्यों में चुनाव होना निर्धारित है। लेकिन जम्मू -कश्मीर में लगातार की जा रही तैयारियों के बीच ऐसी संभावना जताई जा सकती है कि सरकार साल 2023 में इस राज्य में भी विधानसभा का चुनाव करवा सकती है। साल 2023 में राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे बड़े राज्यों के साथ ही पूर्वोत्तर के त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड और मिजोरम में भी विधानसभा चुनाव होने हैं इस तरह करीब दस राज्यों में चुनाव हो सकता है। इन राज्यों के जो भी परिणाम आएंगे वह आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी की दशा और दिशा दोनों तय करेंगे। आइए जानते है इन सीटों पर देश के अलग-अलग पार्टियों की क्या स्थिति है।

सबसे पहले बात कर्नाटक की करे तो, वर्ष 2018 विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को यहाँ बहुमत नहीं मिला था। भाजपा को 104 सीट मिली थी जबकि कांग्रेस 78 और जेडीएस 37 सीट जीतने में कामयाब रहा था। वहीं बीजेपी नेता के तौर पर बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवाई लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर पुनः राज्य में सरकार का गठन किया था।

लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि भाजपा ने फिर राज्य में 2019 में सरकार का गठन कर येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बनाया, हालांकि 2023 विधानसभा चुनाव को देखते हुऐ राज्य में नेतृत्व परिवर्तन कर येदियुरप्पा की जगह बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया गया। पिछले तीन साल में बीजेपी को दो मुख्यमंत्री बनाने पड़े। इससे आप स्पष्ट रूप से समझ सकते है कि साल 2023 में होने वाला चुनाव कितना महत्वपूर्ण होने जा रहा है।

तेलंगाना में साल 2018 के चुनाव में टीआरएस 88 सीट जीतने में कामयाब रही और मुख्यमंत्री बने चंदशेखर राव। 2018 विधानसभा की बात करें तो यहां कांग्रेस को 19 और बीजेपी को सिर्फ एक सीट ही मिली थी लेकिन एक तरफ जहां भाजपा का मानना है कि 2023 में तेलंगाना में टीआरएस का विकल्प बन उभरेगी तो वहीं दूसरी और चंदशेखर राव 2024 के लोक सभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर बड़ा मोर्चा तैयार करने की कोशिश में हैं।

अब बात करते है राजस्थान की, जहां अभी कांग्रेस की सरकार है और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री हैं। बात यदि साल 2018 के विधान सभा चुनाव कि करे तो बीजेपी को 200 में से सिर्फ 73 सीट पर ही जीत मिली थी। राजस्थान सरकार को चार साल पूरे होने पर मुख्यमंत्री गहलोत ने एलान किया कि आने वाले अप्रैल से बीपीएल परिवारों को साल में 12 सिलेंडर पांच सौ रुपए प्रति सिलेंडर की दर से दिए जाएंगे। जाहीर है पुरानी पेंशन योजना का जिस तरह से फायदा हिमाचल में कांग्रेस को मिला है उसी तरह गहलोत राजस्थान में विभिन्न योजनाओ के सहारे 2023 का चुनाव जितना चाहती है। हांलाकि कांग्रेस में गहलोत और पायलट के बीच जारी विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रही। लेकिन बीजेपी के लिए भी चुनौती कम नहीं है क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया के बीच अंतर्कलह किसी से भी छुपा नहीं है। इसलिए बीजेपी को स्वयं के पार्टी में सुधार की जरूरत है।

अब बात करते है मध्यप्रदेश की जहां, साल 2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से बाहर कर 15 साल बाद यहाँ जीत दर्ज की थी। और कमलनाथ राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। हालांकि करीब 15 महीने भी कांग्रेस इस जनादेश को संभाल नहीं पाई और ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस विधायकों का एक गुट अलग होने के बाद भाजपा की तरफ से शिवराज सिंह चौहान फिर से राज्य के मुख्यमंत्री बने। 2018 के चुनाव में कांग्रेस को 114 सीट जब कि बीजेपी को 109 सीट पर जीत मिली थी। यानि दोनों में करीब 1 प्रतिशत वोट शेयर का अंतर था। वहीं हाल ही में मध्य प्रदेश नगर निकाय चुनाव में जिस तरह से चौंकाने वाले नतीजे आये है, उससे भी बीजेपी के लिए राह आसान नहीं होगी।

डेढ़ दशक तक छत्तीसगढ़ की सत्ता में रहने के बाद 2018 के चुनाव में आखिरकार भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। यहाँ कांग्रेस ने 90 विधानसभा सीटों में से 68 पर जीत हासिल की थी जब कि बीजेपी को मात्र 15 सीट ही हासिल हो पाया था। वहीं हालिया उपचुनावों में काँग्रेस ने खुद को जिस हिसाब से मजबूत किया इससे साफ जाहीर है कि 2023 के चुनाव बीजेपी को कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिलेगी।

त्रिपुरा 2018 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 35 सीट और अन्य को 16 सीट मिली थी। लेकिन दोनों के बीच वोट शेयर में एक फीसदी से थोड़ा सा ही ज्यादा का अंतर था। वहीं चुनाव में काँग्रेस खाता तक नहीं खोल पाया और दो फीसदी से भी कम वोट मिले। ऐसे में उम्मीद है कि बीजेपी को रोकने के लिए सीपीएम और कांग्रेस हाथ मिला सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी का सत्ता में वापसी करना बेहद मुश्किल हो जाएगा। इस बार बीजेपी को टीएमसी से भी कड़ी टक्कर मिल सकती है क्यों की त्रिपुरा में कुल आबादी का दो तिहाई बांग्ला भाषा बोलने वाले हैं।

वहीं साल 2018 में, कांग्रेस मेघालय में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन 60 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत हासिल करने में विफल रही। केवल 2 सीटें जीतने वाली भाजपा ने राज्य में सरकार बनाने के लिए नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) से हाथ मिलाया, लेकिन इस बार मेघालय के मुख्यमंत्री कानराड संगमा ने कहा कि उनकी पार्टी नेशनल पीपुल्स पार्टी 2023 में विधानसभा चुनाव में अकेले चुनाव लड़ेगी। बात यदि कॉंग्रेस के करें तो 2023 में होने वाले चुनाव से पहले एक तरह से उसका सफाया हो गया है। अभी उसके पास एक भी विधायक नहीं है। वहीं 2018 के चुनाव में एक भी सीट नहीं जीतने वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस अचानक मेघालय विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई है। उम्मीद है कि इस बार मेघालय चुनाव मुकाबले में टीएमसी के सामने बीजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

साल 2023 के मिजोरम विधानसभा चुनाव में सभी 40 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला भाजपा ने किया है जबकी 2018 में बीजेपी ने एक सीट जीत कर अपना खाता खोला था। वहीं वर्तमान में मिजोरम रमीं मिजो नेशनल फ्रंट की सरकार सत्ता में है। ज़ोरमथांगा के नेतृत्व वाली पार्टी ने 2018 के विधानसभा चुनावों में 40 में से 27 सीटें जीतीं वहीं कांग्रेस मात्रा 4 सीट पर ही जीत हासिल कर सकी थी।

नागालैंड में साल 2018 में नागा पीपुल्स फ्रंट पार्टी 26 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। बावजूद इसके एनडीपीपी-बीजेपी गठबंधन आसानी से बहुमत हासिल करने में कामयाब रही। साल 2018 के चुनाव में नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी को 17 और बीजेपी को 12 सीटों पर जीत मिली थी। वहीं इस बार भी बीजेपी नेफ्यू रियो की एनडीपीप से मिलकर चुनाव लड़ेगी। 2023 के चुनावों में बीजेपी का प्लान 20 सीटों पर लड़ने और अन्य 40 सीटों पर एनडीपीपी उम्मीदवारों का समर्थन करने की है। पिछली चुनाव में यहाँ कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल पाया था। वहीं नेशनल पीपुल्स पार्टी को दो सीटें और जेडीयू को एक सीट पर जीत मिली। जबकि निर्दलीय के खाते में एक सीट गई थी। इस बार के चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी की नजर भी नागालैंड में अपनी पैठ बढ़ाने पर है और वो भी चुनाव लड़ेगी। इसके साथ साथ नागालैंड में 2021 में चुनावी अस्तित्व में आई राइजिंग पीपुल्स पार्टी की इंट्री हो रही है। हालांकि विधानसभा चुनाव से पहले नगालैंड में बीजेपी को झटका देते हुए पार्टी के तीन जिला अध्यक्ष नवम्बर में जेडीयू में शामिल हो गए थे। ये सब आने वाले चुनाव में बीजेपी के लिए सिरदर्द साबित हो सकती है।

जम्मू-कश्मीर अब एक केंद्र शासित प्रदेश हो गया है। यहां का चुनाव पिछले सभी चुनावों से अलग होगा क्यों की परिसीमन के बाद राज्य में कई सीटें रिजर्व हो गई हैं और पहला चुनाव भी होगा। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर में लगातार की जा रही तैयारियों के बीच ऐसी संभावना जताई जा रही है की सरकार इस राज्य में भी अगले साल विधानसभा का चुनाव करवा सकती है।

आबादी के लिहाज़ से देश का सबसे बड़ा प्रांत उत्तर प्रदेश का निकाय चुनाव ओबीसी आरक्षण प्रकरण के बाद काफी अहम और चर्चित हो गया है। भाजपा और क्षेत्रीय दलों का कॉकटेल जनाधार विधानसभा चुनावों में ये भी तय करेगा कि किस क्षेत्रीय दल का किस राष्ट्रीय पार्टी से कैसा रिश्ता है। साल 2023 में लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनावों की तैयारियों में सरकारें जनकल्याणकारी योजनाओं की झड़ी से जनता को लुभाने का भरपूर प्रयास करेंगे। इसके अतिरिक्त संभावना है कि समान नागरिक कानून पास करवाकर भाजपा चुनावों में लाभ लेने का प्रयास करे। हिंदुत्व, विकास, राष्ट्रवाद के मुद्दों के बीच पिछड़ा वर्ग, आरक्षण, मंहगाई और बेरोजगारी के मुद्दों का शोर शराबा 2023 में सुनाई देगा। भाजपा जैसे शक्तिशाली दल से लड़ने के लिए आगामी वर्ष में विपक्षी दलों की एकजुटता के प्रयास किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होंगे। कांग्रेस और भाजपा विरोधी तमाम क्षेत्रीय दलों के लिए 2023 संघर्ष से भरा होगा।

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