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उद्धव ठाकरे को झटका, शिंदे गुट में शामिल हुईं मनीषा कायंदे

इससे पहले वरिष्ठ नेता शिशिर शिंदे ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।

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शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे की विधायक मनीषा कायंदे शिवसेना यानी शिंदे गुट में शामिल हो गई हैं। ऐसी संभावना थी कि उपनेता सुषमा अंधारे की वजह से अंधेरे में चली गई यूबीटी की महिला नेता कुछ ऐसा कदम उठाएंगी। इसकी शुरुआत मनीषा कायंदे ने की है। माविया की सरकार में शामिल मंत्रियों समेत पार्टी के 40 विधायकों ने पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ दिया। एक और महिला नेता के पार्टी छोड़ने से उन्हें क्या फर्क पड़ेगा? लेकिन ठाकरे के लिए यह एक वास्तविक झटका है।

मनीषा कायंदे की राजनीति करियर बीजेपी से ही शुरू हुई। वहीं एक समय था जब उन्होंने पार्टी के एक वरिष्ठ नेता पर आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दी थी। वह 2016 में शिवसेना में शामिल हुई थी। उस समय राज्य में भाजपा की सरकार थी। देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री थे। 2018 में, ठाकरे ने पार्टी के कई वफादारों को दरकिनार करते हुए विधान परिषद के लिए कायंदे को नामित किया। मनीषा कायंदे पार्टी में शामिल होने के बाद महज दो साल में विधान परिषद में शामिल हो गईं। पार्षद और विधायक पद के लिए कई सालों से इंतजार कर रहे लोगों को पीछे छोड़कर कायंदेबाई ने महज दो साल में वो कर दिखाई जो कोई ना कर सका।

हालांकि कायंदे कोई जननेता नहीं थी। उन्हें जनता ने नहीं चुना था बल्कि पार्टी ने ही उन्हें बड़े स्तर पर बैठाया था। लेकिन वह पढ़ी-लिखी थी। उनमें पार्टी की स्थिति को पेश करने की क्षमता थी। उद्धव ठाकरे के मुताबिक अहम बात यह है कि कायंदेबाई बीजेपी से काफी नाराज थीं। और उन्हें इसी उम्मीद से विधान परिषद में विधायक बनाया गया था कि यह गोला-बारूद काम आएगा।

मनीषा कायंदे को उद्धव ठाकरे ने राजनीतिक रूप से पुनर्वासित किया था। उन्होंने बुरे वक्त में उनका साथ दिया। वही मनीषा कायंदे उद्धव ठाकरे को नारियल थमाकर अब एकनाथ शिंदे के साथ चली गई हैं। मनीषा कायंदे, जो कई वर्षों से भाजपा में कार्यरत थी, उन्होंने जब भाजपा छोड़ी, तब भी भाजपा कार्यकर्ताओं या नेताओं के मन में उनके प्रति सहानुभूति थी। कई लोगों की राय थी कि इस महिला के साथ अन्याय हुआ है। लेकिन यूबीटी को छोड़ने का फैसला लेने के बाद अब किसी में मनीष कायंदे के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है।

मनीषा कायंदे ने फिर से पुष्टि की है कि राजनीति में भावनाओं का कोई मूल्य नहीं है। बेशक उद्धव ठाकरे भी सुविधा की राजनीति कर रहे हैं, इसलिए उनके लिए कोई सहानुभूति नहीं है। एकनाथ शिंदे के साथ जाने के बाद भी मनीषा कायंदे पर धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगा है।

हालांकि पार्टी प्रवक्ता संजय राउत ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि जब हवा की दिशा बदलती है तो कूड़ा इधर से उधर उड़ता है, कल फिर दिशा बदली तो यह कूड़ा हमारे दरवाजे पर आएगा। राउत का दोष कायंदे से ज्यादा पार्टी प्रमुखों पर है। क्योंकि ठाकरे ने कायंदे को पार्टी में शामिल करने का फैसला कर लिया था। ठाकरे सिर्फ पार्टी में उन्हें शामिल होने तक ही नहीं रुके, बल्कि दो साल में इस महिला को आगे बढ़ाया, उन्हें विधान परिषद में विधायक बना दिया। कई लोग इसका विरोध कर रहे थे। राउत को सीधे ठाकरे से पूछना चाहिए कि उन्होंने इस कचरे को पार्टी में क्यों लिया। और अब कितना और कचरा बचा है इसका हिसाब लगाया जाना चाहिए।

कई वर्षों तक एनसीपी में काम करने के बावजूद हमेशा अंधेरे में रहने वाली सुषमा अंधारे ने यूबीटी में प्रवेश किया। उन्हें उपनेता का पद दिया गया। पार्टी में शामिल होने के बाद चाहे सभाएं हों या प्रेस कांफ्रेंस, वहाँ सिर्फ अंधारे जैसे महिलाएं ही नजर आने लगीं। अंधारे बाई, जो कभी हिंदू देवी-देवताओं के बारे में बहुत व्यंग्यात्मक भाषा में बात करती थीं, सार्वजनिक सभाओं में हिंदू धर्म के बारे में बात करने लगीं। उनके कारण मनीषा कायंदे, नीलम गोरहे जैसे नेता अंधेरे में चले गए। उनकी दृष्टि तो दूर की बात हो गई, पर उनकी वाणी भी लोगों को सुनाई देना बंद हो गया। ठाकरे इस बात से संतुष्ट थे कि अंधारेबाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे तक सभी से बात करती हैं।

नीलम गोरहे हो या कायंदे, ये अंधारे बाई की खोल भाषा में विरोधियों की आलोचना नहीं कर सकते थे, इस प्रकार उनका मूल्य कम हो गया। कायंदेबाई इस निष्कर्ष पर पहुंचीं कि अंधेरे से बाहर निकलने के लिए एकनाथ शिंदे की शिवसेना ही एकमात्र विकल्प है। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि वे आखिरी होंगे। सुषमा अंधारे भी 16 विधायकों की अयोग्यता पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से खामोश हैं। कल अगर वे कोई अलग फैसला लेती हैं तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। वहीं संजय राउत को आज एक बार फिर जवाब देना है।

शिंदे गुट की शिवसेना में शामिल होने के बाद कायंदे ने कहा कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना मूल शिवसेना है, जो बालासाहेब ठाकरे की है। उन्होंने एनसीपी और कांग्रेस के एजेंडे का प्रचार करने के लिए शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत और पार्टी नेता सुषमा अंधारे का नाम लिए बगैर उन पर निशाना साधा। कायंदे ने कहा कि जो लोग हर दिन दूसरों की आलोचना करते हैं, कांग्रेस और एनसीपी के एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं और हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ बोलते हैं, वे शिवसेना का चेहरा नहीं हो सकते। इन शब्दों के बदौलत यूबीटी को अंदाजा हो गया होगा कि वो किस तरह की राजनीति कर रही है, जो उनके पार्टी के सदस्यों को भी उनसे दूर कर रहा है। यूबीटी की राजनीति अब उनके पार्टी के सदस्यों को हजम नहीं हो रही है इसलिए धीरे धीरे सभी सदस्य यूबीटी से अपना पल्ला झाड रहे है। और शिंदे गुट में शामिल हो रहे है।

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