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अमृतकाल की मजबूती का राज: पीएम ने साझा किया 108 साल पुराना किस्सा!

कुछ ही दिनों में मई का महीना शुरू होने वाला है। मैं आपको आज से करीब 108 साल पहले लेकर चलता हूं। साल 1917, अप्रैल और मई के महीनों में देश में आजादी की एक अनोखी लड़ाई लड़ी जा रही थी। 

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 121वें एपिसोड में 108 साल पुराना किस्सा सुनाया। पीएम मोदी ने कहा कि सेनानियों की अमर प्रेरणाओं से ‘अमृतकाल’ को मजबूती मिलती है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “मेरे प्यारे देशवासियों, आज अप्रैल का आखिरी रविवार है। कुछ ही दिनों में मई का महीना शुरू होने वाला है। मैं आपको आज से करीब 108 साल पहले लेकर चलता हूं। साल 1917, अप्रैल और मई के महीनों में देश में आजादी की एक अनोखी लड़ाई लड़ी जा रही थी।
अंग्रेजों के अत्याचार उफान पर थे, गरीबों, वंचितों और किसानों का शोषण अमानवीय स्तर को भी पार कर चुका था। बिहार की उपजाऊ धरती पर ये अंग्रेज किसानों को नील की खेती के लिए मजबूर कर रहे थे। इस खेती से किसानों के खेत बंजर हो रहे थे, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत को इससे कोई मतलब नहीं था।
ऐसे हालात में जब 1917 में गांधी जी बिहार के चंपारण पहुंचे तो किसानों ने उन्हें बताया कि हमारी जमीन मर रही है, खाने के लिए अनाज नहीं मिल रहा है। लाखों किसानों की उस पीड़ा से गांधी जी ने एक संकल्प लिया और वहीं से चंपारण का ऐतिहासिक सत्याग्रह शुरू हुआ।“

देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने आगे बताया, “‘चंपारण सत्याग्रह’ ये बापू का भारत में पहला बड़ा प्रयोग था, उनके सत्याग्रह से पूरी अंग्रेज हुकूमत हिल गई थी। अंग्रेजों को नील की खेती के लिए किसानों को मजबूर करने वाले कानून को स्थगित करना पड़ा, ये एक ऐसी जीत थी जिसने आजादी की लड़ाई में नया विश्वास डाला।

आप सब जानते होंगे इस सत्याग्रह में बड़ा योगदान बिहार के एक और सपूत का भी था, जो आजादी के बाद देश के पहले राष्ट्रपति बने, वो महान विभूति थे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद। उन्होंने ‘चंपारण सत्याग्रह’ पर एक किताब भी लिखी थी, जिसका नाम ‘सत्याग्रह इन चंपारण’, ये किताब हर युवा को पढ़नी चाहिए।”

पीएम मोदी ने आगे बताया, “अप्रैल में ही स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई के कई और अमिट अध्याय जुड़े थे। अप्रैल की 6 तारीख को ही गांधी जी की ‘दांडी यात्रा’ संपन्न हुई थी। 12 मार्च से शुरू होकर 24 दिनों तक चली इस यात्रा ने अंग्रेजों को झकझोर कर रख दिया था। अप्रैल में ही जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ था, पंजाब की धरती पर इस रक्तरंजित इतिहास के निशान आज भी मौजूद हैं।“

उन्होंने बाबू वीर कुंवर सिंह को याद करते हुए कहा, “ कुछ ही दिनों में 10 मई को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की वर्षगांठ भी आने वाली है। आजादी की उस पहली लड़ाई में जो चिंगारी उठी थी, वो आगे चलकर लाखों सेनानियों के लिए मशाल बन गई। अभी 26 अप्रैल को हमने 1857 की क्रांति के महान नायक बाबू वीर कुंवर सिंह जी की पुण्यतिथि भी मनाई है।

बिहार के महान सेनानी से पूरे देश को प्रेरणा मिलती है और हमें ऐसे ही लाखों स्वतंत्रता सेनानियों की अमर प्रेरणाओं को जीवित रखना है। हमें उनसे जो ऊर्जा मिलती है, वो अमृतकाल के हमारे संकल्पों को नई मजबूती देती है।”
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