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‘उद्योग’ की परिभाषा करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय स्थापित करेगा नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ

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भारत में श्रम कानूनों के दायरे को लेकर दशकों से चल रही कानूनी बहस को अंतिम रूप देने की दिशा में भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने बड़ा कदम उठाया है। सोमवार (16 फरवरी)को शीर्ष अदालत ने घोषणा की कि इंडस्ट्री की कानूनी परिभाषा पर अंतिम निर्णय के लिए नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ गठित की जाएगी। इस अहम मामले की सुनवाई 17 मार्च 2026 से शुरू होने की संभावना है।

यह संविधान पीठ मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अगुवाई में गठित होगी। रिपोर्टों के अनुसार, पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली भी शामिल होंगे। अदालत का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि क्या आधुनिक सरकारी कल्याणकारी योजनाएं और सामाजिक संस्थान भी उन्हीं श्रम कानूनों के दायरे में आएंगे, जो वाणिज्यिक कारखानों और उद्योगों पर लागू होते हैं।

विवाद की जड़ 1978 के ऐतिहासिक मामले बंगलौर वाटर सप्प्लाई एंड सीवेज बोर्ड विरुद्ध ए. राजप्पा में है। सात न्यायाधीशों की पीठ के उस फैसले में न्यायमूर्ति वी. कृष्ण अय्यर ने ट्रिपल टेस्ट सिद्धांत प्रतिपादित किया था। इस परीक्षण के अनुसार, कोई भी संस्था इंडस्ट्री मानी जाएगी यदि—

  1. वह व्यवस्थित गतिविधि संचालित करती हो,
  2. नियोक्ता और कर्मचारी के बीच संगठित सहयोग हो,
  3. और वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन/वितरण मानव आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जाता हो।

इस व्यापक व्याख्या के कारण अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों, क्लबों और सरकारी अनुसंधान निकायों को भी इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट, 1947 के दायरे में लाया गया, जिससे उनके कर्मचारियों को यूनियन बनाने और सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार मिला।

2005 में उत्तर प्रदेश राज्य विरुद्ध जय बीर सिंग मामले में पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 1978 के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत जताते हुए इसे बड़ी पीठ को भेजा। वर्ष 2017 में सात न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट किया कि चूंकि ‘बैंगलोर वाटर सप्लाई’ फैसला स्वयं सात न्यायाधीशों द्वारा दिया गया था, इसलिए उसमें बदलाव या उसे निरस्त करने के लिए नौ-न्यायाधीशों की पीठ आवश्यक होगी।

आगामी सुनवाई में अदालत यह परखेगी कि क्या 21वीं सदी के परिप्रेक्ष्य में भी ट्रिपल टेस्ट उपयुक्त कानूनी मानक है। साथ ही, औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम, 1982 के प्रभाव और औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के प्रावधानों का भी परीक्षण किया जाएगा।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि क्या सरकारी विभागों द्वारा संचालित सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं और विशिष्ट गतिविधियों को औद्योगिक गतिविधि माना जाए या वे अधिनियम की धारा 2(जे) के दायरे से बाहर रहें।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि 28 फरवरी 2026 तक सभी पक्ष अपनी लिखित दलीलें अद्यतन कर सकते हैं या अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल कर सकते हैं। अदालत ने सुनवाई को दो दिन में पूरा करने के उद्देश्य से समय-सीमा तय की है, याचिकाकर्ताओं को मुख्य बहस के लिए तीन घंटे और प्रत्युत्तर के लिए एक घंटा दिया जाएगा।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारत में श्रम संबंधों, यूनियन अधिकारों और सरकारी योजनाओं की कानूनी स्थिति पर दूरगामी प्रभाव डालेगा। नौ-न्यायाधीशों की यह संविधान पीठ लंबे समय से लंबित इस संवैधानिक प्रश्न पर निर्णायक स्पष्टता प्रदान कर सकती है।

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