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Wednesday, January 7, 2026
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17,000 करोड़ के बैंक ऋण घोटाले में अनिल अंबानी दिल्ली पहुंचे, आज ईडी के सामने पेशी।

पहले ही निकल चुका है लुकआउट नोटिस।

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रिलायंस ग्रुप के चेयरमैन अनिल अंबानी मंगलवार (5 अगस्त)को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के समक्ष पेश होने के लिए नई दिल्ली पहुंचे हैं, जहां उनसे ₹17,000 करोड़ के बैंक लोन धोखाधड़ी मामले में पूछताछ की जाएगी। यह मामला प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत चल रही जांच का हिस्सा है।

ईडी ने जुलाई के अंत में तीन दिवसीय छापेमारी अभियान चलाया था, जिसमें रिलायंस ग्रुप से जुड़ी लगभग 35 ठिकानों पर तलाशी ली गई थी। यह कार्रवाई करीब 50 कंपनियों और 25 व्यक्तियों से संबंधित थी, जिनमें रिलायंस ग्रुप के कई शीर्ष अधिकारी शामिल हैं।

इसके बाद, ईडी ने अनिल अंबानी को समन जारी किया, जिसके तहत आज (मंगलवार) उन्हें दिल्ली स्थित ईडी मुख्यालय में पूछताछ के लिए बुलाया गया है।

जांच एजेंसी के मुताबिक, यह घोटाला अनिल अंबानी की कई कंपनियों से जुड़ा है, विशेष रूप से रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर (R Infra) पर गंभीर आरोप लगे हैं। ईडी का आरोप है कि R Infra ने बड़े पैमाने पर लोन की रकम को इंटर-कॉरपोरेट डिपॉजिट्स (ICDs) के रूप में रिलायंस ग्रुप की अन्य कंपनियों में डायवर्ट किया।

इन ट्रांजैक्शनों को CLE नामक कंपनी के जरिए अंजाम दिया गया, जिसे R Infra द्वारा “रिलेटेड पार्टी” के रूप में प्रकट नहीं किया गया था। इससे शेयरहोल्डर और ऑडिट कमिटी की मंज़ूरी से बचने का प्रयास किया गया।

ईडी ने जांच के तहत 39 बैंकों को नोटिस भेजा है और उनसे सवाल किया है कि, “जब ऋण लेने वाली कंपनियां भुगतान चूकने लगीं, तब भी इन बैंकों ने न तो अलर्ट जारी किया और न ही कानून के तहत सूचना दी।”

एक वरिष्ठ ईडी अधिकारी ने मीडिया से बातचीत में कहा।ईडी के अनुसार, बैंकों की चुप्पी कानूनी कर्तव्य की अनदेखी के बराबर है। ईडी ने इस मामले में पहली गिरफ्तारी 1 अगस्त को की, जब बिस्वाल ट्रेडलिंक प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक पार्थ सारथी बिस्वाल को गिरफ्तार किया गया। बिस्वाल पर आरोप है कि उसने रिलायंस पावर की ओर से ₹68.2 करोड़ के फर्जी बैंक गारंटी दस्तावेज तैयार किए।

इसके अलावा, ईडी ने अनिल अंबानी के विदेश जाने पर रोक लगाने के लिए लुकआउट सर्कुलर (LOC) भी जारी किया है।

बैंक ऋण घोटालों में बड़े कॉर्पोरेट घरानों की भूमिका पर लंबे समय से उंगलियां उठती रही हैं, पर असली सवाल यह है कि क्या सिर्फ पूछताछ और गिरफ्तारी से न्याय सुनिश्चित होगा, या बैंकिंग व्यवस्था में मौजूद दूरदर्शिताहीनता और आतंरिक मिलीभगत पर भी ठोस कार्रवाई होगी?

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