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Monday, January 26, 2026
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अनिल अंबानी और रिलायंस कम्युनिकेशन का लोन अकाउंट ‘फ्रॉड’ घोषित!

एसबीआई के बाद बैंक ऑफ इंडिया की सख्ती

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भारतीय बैंकिंग सेक्टर में एक और बड़ा झटका सामने आया है। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के बाद अब बैंक ऑफ इंडिया (बीओआई) ने भी रिलायंस कम्युनिकेशन और रिलायंस टेलीकॉम समेत प्रमोटर अनिल धीरजलाल अंबानी के लोन अकाउंट को ‘फ्रॉड’ करार दिया है। बैंक ने साफ आरोप लगाया है कि कंपनी ने लिए गए कर्ज का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के अलावा अन्य कार्यों में किया।

बीओआई की ओर से जारी नोटिस के मुताबिक, रिलायंस कम्युनिकेशंस का खाता 30 जून 2017 को नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) में बदल गया था, जब 724.78 करोड़ रुपये की बकाया राशि का भुगतान नहीं किया गया। बैंक का कहना है कि बार-बार संपर्क करने के बावजूद उधारकर्ता और गारंटर न तो सहयोग कर रहे हैं और न ही भुगतान कर रहे हैं। इसीलिए इसे ‘फ्रॉड’ घोषित किया गया है।

इसी तरह रिलायंस टेलीकॉम के मामले में भी 51.77 करोड़ रुपये के बकाया पर कंपनी का खाता और निदेशकों ग्रेस थॉमस व सतीश सेठ के खाते फ्रॉड घोषित किए गए। नोटिस में अन्य नामों में गौतम भाईलाल दोषी, दगदुलाल कस्तूरीचंद जैन और प्रकाश शेनॉय भी शामिल हैं।

गौरतलब है कि इसी मामले में शनिवार को अनिल अंबानी के आवास पर सीबीआई ने छापेमारी की थी। इसके तुरंत बाद कंपनी के प्रवक्ता ने एक बयान जारी कर सभी आरोपों को सख्ती से नकारा। प्रवक्ता ने कहा, यह मामला करीब दस साल पुराना है। उस समय अनिल अंबानी सिर्फ नॉन-एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर थे और कंपनी के रोज़ाना संचालन से उनका कोई संबंध नहीं था। एसबीआई ने इस मामले में पांच अन्य गैर-कार्यकारी निदेशकों के खिलाफ कार्रवाई वापस ले ली थी, लेकिन केवल अनिल अंबानी को निशाना बनाना समझ से परे है।

कंपनी का कहना है कि फिलहाल रिलायंस कम्युनिकेशंस की जिम्मेदारी क्रेडिटर्स की कमेटी के पास है, जिसकी अगुवाई एसबीआई कर रहा है। यह पूरी प्रक्रिया एक रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल (आरपी) की निगरानी में चल रही है। मामला पिछले छह सालों से नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) और अन्य अदालतों, जिसमें सुप्रीम कोर्ट भी शामिल है, में लंबित है।

बैंक ऑफ इंडिया का यह कदम एसबीआई की हालिया कार्रवाई के बाद आया है। लगातार दूसरे बड़े बैंक द्वारा खातों को फ्रॉड घोषित किए जाने से न केवल रिलायंस कम्युनिकेशंस और उसके प्रमोटरों की मुश्किलें बढ़ेंगी, बल्कि बैंकिंग सेक्टर में भी कर्ज जोखिम और कॉर्पोरेट गवर्नेंस को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

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