भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड(BHEL) ने भारतीय नौसेना के लिए स्वदेशी मरीन गैस टरबाइन कार्यक्रम का नेतृत्व संभाला है। यह परियोजना रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 के ‘मेक-I’ श्रेणी के तहत स्वीकृत की गई है, जिसका उद्देश्य 24 से 28 मेगावाट क्षमता का इंजन विकसित करना है, जो भविष्य के युद्धपोतों के लिए उपयोगी होगा।
अब तक भारतीय नौसेना अपने युद्धपोतों के लिए विदेशी प्रणोदन प्रणालियों पर निर्भर रही है, जिनमें यूक्रेन की ज़ोर्या-माशप्रोएक्ट और अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक LM2500 टरबाइन प्रमुख हैं। हालांकि ये प्रणालियां विश्वसनीय रही हैं, लेकिन इन पर निर्भरता ने आपूर्ति श्रृंखला जोखिम, भू-राजनीतिक दबाव और उच्च लागत जैसी चुनौतियां भी पैदा की हैं।
ज्ञात हो की, स्वदेशीकरण के पहले प्रयास कि गैस टरबाइन अनुसंधान प्रतिष्ठान द्वारा विकसित कावेरी मरीन गैस टरबाइन परियोजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकी। इसके अलावा, तकनीक हस्तांतरण से जुड़े प्रयास भी सीमित परिणाम ही दे पाए। ऐसे में यह नया कार्यक्रम अधिक समन्वित, वित्तपोषित और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।
इस परियोजना के तहत विकसित होने वाला 24–28 मेगावाट वर्ग का इंजन विध्वंसक (डिस्ट्रॉयर), फ्रिगेट और बड़े युद्धपोतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इन जहाजों को ऐसी प्रणोदन प्रणाली की जरूरत होती है जो लंबी दूरी तक लगातार संचालन, तेज गति और युद्ध परिस्थितियों में उच्च गतिशीलता प्रदान कर सके।
BHEL इस कार्यक्रम में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के अंतर्गत आने वाले अनुसंधान संस्थान, ‘गैस टरबाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट’ और ‘नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी’ के साथ मिलकर काम करेगा। परियोजना के तहत चार प्रोटोटाइप तैयार किए जाएंगे, जिनका व्यापक परीक्षण किया जाएगा। सफल परीक्षण के बाद कम से कम 40 इंजनों का उत्पादन कर उन्हें नौसेना के प्लेटफॉर्म्स में शामिल किया जाएगा।
इस पहल में उन्नत मटेरियल, हाई-टेम्परेचर मेटलर्जी और प्रिसिजन इंजीनियरिंग जैसी तकनीकों का उपयोग होगा, जिससे भारत के रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र को भी मजबूती मिलेगी। मरीन गैस टरबाइन को समुद्री वातावरण, जैसे खारे पानी और लंबे समय तक निरंतर संचालन के अनुकूल बनाना एक बड़ी तकनीकी चुनौती है।
रणनीतिक दृष्टि से यह परियोजना भारत को विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता से मुक्त करेगी और युद्ध या संकट के समय परिचालन स्वतंत्रता सुनिश्चित करेगी। साथ ही, इससे दीर्घकालिक लागत में कमी आएगी और रखरखाव पर बेहतर नियंत्रण मिलेगा।
इस कार्यक्रम की सफलता भारत को हिंद महासागर क्षेत्र और अन्य मित्र देशों को उन्नत प्रणोदन प्रणालियां निर्यात करने का अवसर भी दे सकती है। यह पहल ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य के अनुरूप है और भारत की समुद्री सुरक्षा संरचना को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएगी।
BHELने पहले भी रक्षा क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाते हुए गैस टरबाइन तकनीक में तीन दशक से अधिक का अनुभव हासिल किया है। कंपनी की मजबूत ऑर्डर बुक और तकनीकी क्षमता इसे इस जटिल परियोजना को सफलतापूर्वक पूरा करने में सक्षम बनाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना केवल एक तकनीकी विकास नहीं, बल्कि भारत की सामरिक संप्रभुता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।
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