भारतीय सेना ने आधुनिक युद्धक्षेत्र की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए स्वदेशी ‘स्वॉर्म वॉरफेयर’ परियोजना की शुरुआत की है। इस पहल के तहत सेना ने एक स्वदेशी स्वॉर्म एल्गोरिद्म विकसित करने के लिए निविदाएं आमंत्रित की हैं, जिसका उद्देश्य मल्टी-ड्रोन ऑपरेशंस के लिए सुरक्षित, एकीकृत और विक्रेता-स्वतंत्र ढांचा तैयार करना है।
यह परियोजना छह महीने की अवधि में दो चरणों में पूरी की जाएगी, जिसमें मई 2026 के मध्य में प्री-बिड बैठक प्रस्तावित है। इस पहल के पीछे मुख्य कारण ड्रोन प्रणालियों में विदेशी, विशेषकर चीनी कंपोनेंट्स को लेकर बढ़ती सुरक्षा चिंताएं हैं। पिछले कुछ वर्षों में सामने आए जोखिमों के बाद आपूर्ति श्रृंखला की जांच और कड़ी कर दी गई है, और आगामी रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2026 में ऐसे तत्वों को हटाने के लिए स्पष्ट प्रावधान जोड़े जाएंगे।
परियोजना के पहले चरण में स्वदेशी ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और सॉफ्टवेयर-आधारित इंटीग्रेशन फ्रेमवर्क विकसित किया जाएगा। इसकी खासियत यह होगी कि मौजूदा ड्रोन प्लेटफॉर्म्स को बिना किसी हार्डवेयर या फर्मवेयर बदलाव के एकीकृत कमांड के तहत संचालित किया जा सकेगा। साथ ही, इसमें पूरी तरह ऑफलाइन संचालन की क्षमता भी शामिल होगी, ताकि युद्ध जैसे संवेदनशील हालात में बाहरी नेटवर्क या क्लाउड सिस्टम पर निर्भरता से बचा जा सके।
इस चरण के अंत में एक लाइव फील्ड डेमो आयोजित किया जाएगा, जिसमें कई ड्रोन एकीकृत कमांड के तहत निगरानी और समन्वित मिशन, जैसे पेलोड डिलीवरी को अंजाम दिया जाएगा।
दूसरा चरण चार महीने का होगा, जो इस परियोजना को विकेंद्रीकृत स्वायत्तता की दिशा में आगे बढ़ाएगा। इसमें ऑनबोर्ड कंप्यूटिंग, स्वदेशी सॉफ्टवेयर स्टैक और उन्नत युद्धक्षेत्र सहनशीलता शामिल होगी। परीक्षण के दौरान ड्रोन को जटिल परिस्थितियों में परखा जाएगा, जैसे फॉर्मेशन बदलना, कार्यों का पुनर्वितरण, टकराव से बचाव और संचार बाधित होने की स्थिति में भी संचालन जारी रखना।
भारतीय सेना ने स्पष्ट किया है कि इस परियोजना में स्वदेशी नियंत्रण अनिवार्य होगा। चयनित भागीदार के साथ सोर्स कोड और बौद्धिक संपदा साझा की जाएगी, ताकि तकनीक पर पूर्ण राष्ट्रीय स्वामित्व सुनिश्चित किया जा सके।
यह पहल ऐसे समय में आई है जब हाल के वैश्विक संघर्षों में ड्रोन स्वॉर्म तकनीक की उपयोगिता स्पष्ट रूप से सामने आई है। निगरानी, लॉजिस्टिक्स, पेलोड डिलीवरी और युद्ध संचालन में इनकी भूमिका लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस परियोजना के जरिए भारतीय सेना एक ऐसा साझा नियंत्रण प्लेटफॉर्म विकसित करना चाहती है, जो विभिन्न प्रकार के ड्रोन को एकीकृत प्रणाली में जोड़ सके और किसी एक विक्रेता पर निर्भर न रहे।
यह पहल ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण के प्रयासों को भी मजबूती देती है। साथ ही, यह वायुसेना और नौसेना की समानांतर स्वदेशी ड्रोन और स्वायत्त प्रणाली परियोजनाओं के साथ मिलकर देश की समग्र रक्षा क्षमता को सुदृढ़ करेगी।
भारतीय सेना की यह पहल ड्रोन युद्ध में तकनीकी आत्मनिर्भरता और परिचालन संप्रभुता की दिशा में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव के रूप में देखी जा रही है।
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