भारत की भूमि और संपत्ति व्यवस्था तेजी से डिजिटल युग में प्रवेश कर रही है। अब देश के 19 राज्यों में नागरिक अपने घर बैठे डिजिटल हस्ताक्षरित भूमि रिकॉर्ड डाउनलोड कर सकते हैं, जिन्हें कानूनन पूरी तरह मान्य माना जाएगा। इसके साथ ही, 406 जिलों में बैंक और वित्तीय संस्थान ऑनलाइन माध्यम से मॉर्गेज की जांच कर रहे हैं, जिससे संपत्ति ऋण और लेनदेन में होने वाली देरी में कमी आने की उम्मीद है।
ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत भूमि संसाधन विभाग (Department of Land Resources) द्वारा रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (RoR) के लिए एक व्यापक ऑनलाइन प्रणाली लागू की गई है। पहले भूमि स्वामियों को अपने रिकॉर्ड प्राप्त करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते थे और लंबी कागजी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता था। अब डिजिटल हस्ताक्षर के साथ RoR की प्रतियां ऑनलाइन उपलब्ध हैं और उनकी वैधता भौतिक दस्तावेजों के समान है।
उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, तमिल नाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, केरल और उत्तराखंड इन राज्यों के नागरिक अब घर बैठे डिजिटल रूप से वैध भूमि रिकॉर्ड (लैंड रिकॉर्ड) डाउनलोड कर सकते हैं।
इस डिजिटल बदलाव का लाभ सिर्फ आम नागरिकों तक सीमित नहीं है। बैंक और वित्तीय संस्थान भी इस प्रणाली से लाभान्वित हो रहे हैं। पहले जहां जमीन पर पहले से किसी ऋण के बदले मॉर्गेज की स्थिति की जांच मैन्युअल रूप से करनी पड़ती थी, अब यह काम एक सुरक्षित पोर्टल के माध्यम से तुरंत किया जा सकता है। इससे किसानों, घर खरीदारों और छोटे उद्यमीयों को ऋण मिलने की प्रक्रिया तेज होने की संभावना है।
ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण भारत में भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण लगभग पूर्ण हो चुका है। देश के 97.27 प्रतिशत गांवों में रिकॉर्ड ऑफ राइट्स का कम्प्यूटराइजेशन किया जा चुका है, जबकि 97.14 प्रतिशत गांवों में भूमि सीमाओं को दर्शाने वाले कैडस्ट्रल मानचित्र भी डिजिटल रूप में उपलब्ध हैं। करीब 85 प्रतिशत गांवों में पाठ्य रिकॉर्ड को मानचित्रों से जोड़ दिया गया है, जिससे भूमि विवरण अधिक स्पष्ट और भरोसेमंद हुआ है।
शहरी क्षेत्रों में भूमि प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए ‘नक्शा’ (NAKSHA) योजना के तहत काम किया जा रहा है। इस योजना के अंतर्गत 157 शहरों में हाई-रिज़ॉल्यूशन हवाई सर्वेक्षण किए जा रहे हैं। अब तक 116 शहरों में सर्वेक्षण पूरा हो चुका है, जिसमें लगभग 6,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र कवर किया गया है। कई स्थानों पर जमीनी सत्यापन भी शुरू हो गया है, जिससे शहरी इलाकों में भूमि विवाद और स्वामित्व से जुड़ी अस्पष्टता कम होने की उम्मीद है।
डिजिटल सुधारों की एक अहम कड़ी यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (ULPIN) है। यह 14 अंकों की संख्या भौगोलिक निर्देशांकों पर आधारित होती है और भूमि के लिए आधार जैसी विशिष्ट पहचान का काम करती है। इसका उद्देश्य धोखाधड़ी रोकना और रिकॉर्ड में अनधिकृत बदलाव को कठिन बनाना है। नवंबर 2025 तक 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 36 करोड़ से अधिक भूमि भूखंडों को ULPIN आवंटित किए जा चुके हैं।
संपत्ति पंजीकरण को सरल बनाने के लिए नेशनल जेनरिक डॉक्यूमेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम (NGDRS) को भी लागू किया गया है, जो पंजाब, महाराष्ट्र और हिमाचल प्रदेश सहित 17 राज्यों में सक्रिय है। करीब 89 प्रतिशत सब-रजिस्ट्रार कार्यालयों को राजस्व कार्यालयों से जोड़ दिया गया है, जिससे पंजीकरण के बाद भूमि रिकॉर्ड अपने आप अपडेट हो जाते हैं।
सरकार ने 2025-26 के लिए ₹1,050 करोड़ का बजट जारी किया है, जिसका उद्देश्य भूमि की लेनदेन को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और व्यापार-अनुकूल बनाना है। इन डिजिटल पहलों को ‘डिजिटल इंडिया’ के तहत भूमि प्रशासन में एक संरचनात्मक सुधार के रूप में देखा जा रहा है, जिससे नागरिकों और अर्थव्यवस्था दोनों को दीर्घकालिक लाभ मिलने की संभावना है।
यह भी पढ़ें:
वेनेजुएला पर कार्रवाई के बाद अमेरिका का अगला निशाना कोलंबिया? ट्रंप ने दी खुली धमकी
“जम्मू और कश्मीर के पूरे क्षेत्र को भारत में फिर से मिला देना चाहिए”



