भारत और रूस के बीच पाँचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट Su-57 को लेकर बातचीत एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई है। रूस ने पुष्टि की है कि इस सौदे पर चर्चा अब प्रारंभिक स्तर से आगे बढ़कर गहन तकनीकी और औद्योगिक चरण में प्रवेश कर चुकी है। हैदराबाद में आयोजित विंग्स इंडिया 2026 एयर शो के दौरान रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन (UAC) के मुख्य कार्यकारी वादिम बदेखा ने मीडिया को बताया कि नई दिल्ली के साथ वार्ताएं अब विस्तृत तकनीकी योजना और औद्योगिक सहयोग पर केंद्रित हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा बातचीत केवल विमान की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक एयरोस्पेस साझेदारी की तकनीकी रूपरेखा तय करना है।संकेत मिला है कि इस तरह के समझौते आने वाली पीढ़ियों तक द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित करते हैं। इस प्रगति से यह स्पष्ट होता है कि भारत Su-57 को सीधे ‘ऑफ-द-शेल्फ’ खरीदने के बजाय भारतीय वायुसेना की विशिष्ट परिचालन आवश्यकताओं के अनुरूप अनुकूलित करना चाहता है।
चर्चा का एक अहम पहलू Su-57 का भारत में स्थानीय उत्पादन है। इसके लिए Su-30MKI कार्यक्रम के तहत पहले से मौजूद बुनियादी ढांचे का उपयोग करने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। यह मॉडल भारत की ‘मेक इन इंडिया’ नीति के अनुरूप है और पहले के लाइसेंस प्राप्त निर्माण कार्यक्रमों के अनुभव पर आधारित है।
UAC प्रमुख ने कहा है कि प्रस्तावित ढांचे में भारतीय उद्योगों की व्यापक भागीदारी को प्राथमिकता दी जाएगी। इसमें स्वदेशी मिशन कंप्यूटर, एवियोनिक्स और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम को रूसी स्टेल्थ एयरफ्रेम में एकीकृत करने की संभावना शामिल है। यदि यह रणनीति लागू होती है, तो भारत की विदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता कम हो सकती है और स्थानीय कंपनियों को पाँचवीं पीढ़ी की तकनीकों में महत्वपूर्ण अनुभव मिलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अनुभव भारत के स्वदेशी कार्यक्रमों, विशेष रूप से एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA), के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है। Su-57 के स्थानीय असेंबली और रखरखाव से स्टेल्थ कोटिंग, सेंसर फ्यूजन और लो-ऑब्ज़र्वेबल तकनीकों में दक्षता बढ़ सकती है।
हालांकि, बदेखा ने इस परियोजना की जटिलताओं की ओर भी इशारा किया। उन्नत चरण में रूसी इंजीनियरिंग मानकों, भारतीय विनिर्माण क्षमताओं और परिचालन सिद्धांतों के बीच तालमेल बिठाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। तकनीक हस्तांतरण की सीमा, स्वदेशी निर्माण का अनुपात और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूती के मुद्दों पर दोनों देशों की तकनीकी टीमें गहन विचार कर रही हैं।
भारत के लिए स्वदेशी प्रणालियों से युक्त घरेलू रूप से निर्मित Su-57 एक प्रभावी अंतरिम समाधान बन सकता है, जब तक कि पूरी तरह स्वदेशी स्टील्थ फाइटर सेवा में नहीं आ जाते। वहीं, रूस के लिए यह समझौता दुनिया के सबसे प्रतिस्पर्धी रक्षा बाजारों में अपनी दीर्घकालिक उपस्थिति को मजबूत करने का अवसर है।
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