भारत का चाय निर्यात वित्त वर्ष 2024-25 में 2,57,880 टन तक पहुंच गया है, जो कि पिछले वर्ष के 2,50,730 टन के मुकाबले 2.85 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। टी बोर्ड ऑफ इंडिया द्वारा जारी ताजा आंकड़ों में यह जानकारी सामने आई है। चाय निर्यात में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मजबूत मांग और देश के प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों से निर्बाध आपूर्ति के कारण हुई है।
आंकड़ों के अनुसार, उत्तर भारत से चाय का निर्यात 8.15% बढ़कर 1,61,200 टन हो गया है, जो कि पिछले वित्त वर्ष में 1,49,050 टन था। इसके विपरीत, दक्षिण भारत से चाय निर्यात में 4.92% की गिरावट देखी गई है और यह 96,680 टन रह गया, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा 1,01,680 टन था।
वित्त वर्ष 2024-25 में चाय का औसत निर्यात मूल्य प्रति किलोग्राम ₹290.97 रहा, जो कि पिछले वर्ष के ₹258.30 की तुलना में 12.65 प्रतिशत अधिक है। यह मूल्यवृद्धि भारत की प्रीमियम गुणवत्ता वाली चाय की अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बढ़ती मांग को दर्शाती है।
रूस अब भी भारतीय पारंपरिक चाय का सबसे बड़ा आयातक बना हुआ है, और वैश्विक भू-राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद भारत-रूस व्यापारिक रिश्तों में स्थिरता बनी रही। वहीं, ईरान ने भी विशेष रूप से उत्तर भारतीय चाय किस्मों में दिलचस्पी बरकरार रखी, हालांकि भुगतान और मुद्रा से जुड़ी समस्याओं के चलते व्यापार पर कभी-कभी असर पड़ा।
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) भारतीय चाय का एक प्रमुख आयातक बना रहा, जो न केवल एक उपभोक्ता के रूप में बल्कि एक पुनर्निर्यात केंद्र के रूप में भी काम कर रहा है। यूनाइटेड किंगडम खासकर असम और दार्जिलिंग चाय के लिए एक स्थायी बाजार बना हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी प्रीमियम और स्पेशल ब्लेंड चाय के लिए अपनी मांग में इजाफा किया है और एक उभरते हुए गंतव्य के रूप में उभरा है।
सऊदी अरब, मिस्र, जर्मनी, चीन और कजाकिस्तान जैसे देशों ने भी स्वास्थ्य-केंद्रित और विशेष मिश्रणों वाली भारतीय चाय में रुचि दिखाई है। यह दर्शाता है कि भारत अब सिर्फ पारंपरिक चाय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्वास्थ्य और वेलनेस ट्रेंड्स के अनुरूप खुद को वैश्विक बाजार में ढाल रहा है।
भारत का चाय उद्योग लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। उत्तरी भारत की पारंपरिक चाय, प्रीमियम किस्मों की निरंतर मांग, और नई बाजारों की खोज भारत को वैश्विक चाय निर्यात के मानचित्र पर अग्रणी बना रही है। यदि यह रुझान बरकरार रहता है, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल मात्रा में बल्कि गुणवत्ता आधारित वैश्विक नेतृत्व में भी आगे बढ़ सकता है।
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