कच्चे तेल की बढ़ती कीमत का सेंसेक्स-निफ्टी पर दबाव; बाजार में रह सकती है तेज उतार-चढ़ाव

ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर 92 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंची

कच्चे तेल की बढ़ती कीमत का सेंसेक्स-निफ्टी पर दबाव; बाजार में रह सकती है तेज उतार-चढ़ाव

Crude oil prices jump another 3%

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भारतीय शेयर बाजार में इस सप्ताह तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार निवेशकों की नजर मुख्य रूप से भू-राजनीतिक घटनाक्रम और वैश्विक तेल कीमतों पर रहेगी।

अंतरराष्ट्रीय तेल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर 92 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है। रिपोर्टों के मुताबिक यह लगभग 8.52 प्रतिशत की उछाल के साथ करीब 92.69 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।

विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ सकती है और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

पिछले सप्ताह भारतीय शेयर बाजार में तेज गिरावट दर्ज की गई। प्रमुख सूचकांक BSE Sensex 2,368.29 अंक या लगभग 2.91 प्रतिशत गिरकर बंद हुआ। वहीं Nifty 50 भी 728.2 अंक या करीब 2.89 प्रतिशत टूट गया। विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितता और तेल की कीमतों में उछाल के कारण निवेशकों का रुख सतर्क बना हुआ है।

बाजार पर दबाव का एक बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी है। बाजार अनुमानों के अनुसार पिछले चार कारोबारी सत्रों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय शेयरों से लगभग 21,000 करोड़ रुपये (करीब 2.3 अरब डॉलर) की निकासी की है।

विशेषज्ञों के मुताबिक पश्चिम एशिया संकट, महंगे कच्चे तेल और रुपये में कमजोरी के कारण विदेशी निवेशक फिलहाल जोखिम कम करने की रणनीति अपना रहे हैं।

वैश्विक घटनाक्रम के साथ-साथ घरेलू आर्थिक आंकड़े भी बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। महंगाई के ये आंकड़े यह संकेत देंगे कि बढ़ती तेल कीमतों का देश में जीवनयापन की लागत पर कितना असर पड़ रहा है।

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक पश्चिम एशिया के हालात और कच्चे तेल की कीमतों को लेकर स्पष्टता नहीं आती, तब तक शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें लगातार 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों पर और गहरा पड़ सकता है।

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