भारत में स्वदेशी एयरोस्पेस तकनीक को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए स्पेसरोल्स एयरोस्पेस टेक्नोलॉजीज और वायुव्या डिफेंस ने रणनीतिक सहयोग की घोषणा की है। स्पेसरोल्स ने इस साझेदारी की जानकारी अपने लिंक्डइन हैंडल के माध्यम से दी। यह सहयोग भारत में स्वदेशी जेट इंजन तकनीक के विकास को तेज करने के उद्देश्य से किया गया है। इस साझेदारी के तहत स्पेसरोल्स की उन्नत कंप्रेसर तकनीक और वायुव्या डिफेंस की इंजन प्रोटोटाइपिंग विशेषज्ञता को एक साथ लाया जाएगा, जिससे एयरोस्पेस प्रोपल्शन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
अत्याधुनिक कंप्रेसर तकनीक पर फोकस:
स्पेसरोल्स इस साझेदारी में अपनी पेटेंटेड ABMP एक्सियल फ्लो कंप्रेसर और ओपन फैन आर्किटेक्चर तकनीक लेकर आ रही है। कंपनी के अनुसार यह तकनीक 95 से 98 प्रतिशत तक की दक्षता प्रदान करती है, साथ ही इसमें 15 डेसिबल से कम शोर में कमी और स्टॉल-फ्री संचालन जैसी विशेषताएं हैं। इन विशेषताओं के कारण अगली पीढ़ी के जेट इंजनों की ईंधन दक्षता और पर्यावरणीय प्रभाव में उल्लेखनीय सुधार संभव माना जा रहा है।
स्पेसरोल्स की तकनीक को वैश्विक स्तर पर भी पहचान मिली है। कंपनी के पेटेंट को संयुक्त राज्य अमेरिका पेटेंट और ट्रेडमार्क कार्यालय के एक परीक्षक ने फ्रांस की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी सफ़रान से जुड़े पेटेंट दस्तावेजों में संदर्भित किया था। इससे भारतीय नवाचार की अंतरराष्ट्रीय क्षमता को मान्यता मिली है।
माइक्रो जेट इंजन पर वायुव्या की प्रगति:
दूसरी ओर वायुव्या डिफेंस ने अपने 4 किलो न्यूटन स्वदेशी माइक्रो जेट इंजन के विकास में महत्वपूर्ण प्रगति की है। लगभग 20 किलोग्राम वजन वाला यह इंजन फिलहाल परीक्षण चरण में है, जिसमें थ्रस्ट स्थिरता, थर्मल प्रबंधन और समग्र प्रदर्शन की जांच की जा रही है। इस इंजन में चार-चरणीय एक्सियल कंप्रेसर और दोहरे कम्बशन चेम्बर्स हैं, जो Jet A1 और Jet-4 ईंधन के साथ काम करने में सक्षम हैं। यह कॉम्पैक्ट प्रोपल्शन सिस्टम ड्रोन, मिसाइल और हल्के विमानों के लिए उपयोगी माना जा रहा है।
दोनों कंपनियों के बीच यह सहयोग आत्मनिर्भर भारत की पहल के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्रों में विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करना है।
स्पेसरोल्स की एयरोडायनामिक्स, ब्लेड ऑप्टिमाइजेशन और उच्च तापमान सामग्री पर एक दशक की रिसर्च अब वायुव्या के इंजन कार्यक्रमों के साथ एकीकृत होगी। इससे माइक्रो टर्बोजेट इंजनों की दक्षता, विश्वसनीयता और बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता बढ़ने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस साझेदारी से जल्द ही नए प्रोटोटाइप सामने आ सकते हैं, जिनका उपयोग रक्षा और नागरिक विमानन दोनों क्षेत्रों में किया जा सकता है। यह पहल न केवल स्वदेशी विनिर्माण को गति देगी, बल्कि भारत को वैश्विक एयरोस्पेस तकनीक के अग्रणी देशों की कतार में लाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
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