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‘मंदिर का पैसा देवता का है, गिरती बैंकों को बचाने के लिए नहीं’ सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश

जब कोई सहकारी बैंक खुद ही ‘गंभीर कठिनाई से जूझ रहा हो’, तो मंदिर के धन को अधिक सुरक्षित और बेहतर ब्याज वाले राष्ट्रीयकृत बैंक में ले जाने में क्या समस्या है?

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मंदिर ट्रस्टों के धन के उपयोग पर एक अहम निर्णय सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (5 दिसंबर)को स्पष्ट कहा कि मंदिर में जमा धन देवता की संपत्ति है और इसे किसी भी परिस्थिति में आर्थिक संकट झेल रही सहकारी बैंकों को बचाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत और न्यायमूर्ति जॉयमेल्या बागची की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए केरल की कई सहकारी समितियों की विशेष अनुमति याचिकाएँ खारिज कर दीं।

यह मामला केरल के वायनाड जिले स्थित श्री तिरुनेल्ली देवस्वम से जुड़ा है, जिसने तिरुनेल्ली सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक और मनंथवाडी को-ऑपरेटिव अर्बन सोसाइटी सहित कुछ स्थानीय सहकारी बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) रखे थे। एफडी की अवधि पूरी होने के बाद भी जब बैंकों ने धन लौटाने से इनकार किया और अपनी वित्तीय कठिनाइयों का हवाला दिया, तब मंदिर ट्रस्ट ने केरल हाई कोर्ट का रुख किया।

हाई कोर्ट ने अगस्त 2025 में आदेश दिया था कि सभी एफडी तुरंत तोड़ी जाएँ और मूलधन व ब्याज दो महीनों के भीतर मंदिर ट्रस्ट को लौटा दिया जाए। इसी आदेश को चुनौती देते हुए सहकारी बैंकों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, यह तर्क देते हुए कि इतनी कम समय-सीमा से उनके संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कड़े शब्दों में कहा, “मंदिर का पैसा, सबसे पहले, देवता का धन है। इसे बचाकर रखना और केवल मंदिर के हित में उपयोग करना आवश्यक है। यह किसी सहकारी बैंक की आय या जीवनरेखा नहीं बन सकता।”

पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि हाई कोर्ट के आदेश में आखिर गलती क्या है। कोर्ट ने कहा, “क्या आप मंदिर का पैसा बैंक को बचाने के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं? जब कोई सहकारी बैंक खुद ही ‘गंभीर कठिनाई से जूझ रहा हो’, तो मंदिर के धन को अधिक सुरक्षित और बेहतर ब्याज वाले राष्ट्रीयकृत बैंक में ले जाने में क्या समस्या है?”

बैंक की ओर से यह दलील दी गई कि हाई कोर्ट का ‘अचानक’ दिया गया दो महीने के भीतर भुगतान का निर्देश पूरा करना मुश्किल है। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट कहा कि मियाद पूरी कर चुके जमा धन को मांग पर तुरंत लौटाना बैंक की बाध्यता है और इसमें देरी के बहाने स्वीकार नहीं किए जा सकते।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और कहा कि सहकारी बैंक एफडी की राशि चुकाएँ। हालांकि, अदालत ने उन्हें यह स्वतंत्रता दी कि आवश्यकता होने पर वे समय विस्तार के लिए हाई कोर्ट में आवेदन कर सकते हैं। इस फैसले को मंदिर ट्रस्टों की वित्तीय सुरक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण सिद्धांत की पुन: पुष्टि के रूप में देखा जा रहा है कि धार्मिक संस्थाओं का धन किसी भी तरह की प्रशासनिक या वित्तीय अनियमितताओं का सहारा नहीं बन सकता।

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