सुप्रीम कोर्ट ने रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCOM) उसकी समूह कंपनियों और उद्योगपति अनिल अंबानी से जुड़े कथित बड़े बैंक फ्रॉड मामले की जांच में देरी को लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) पर कड़ी टिप्पणी की है। बुधवार (4 फरवरी)को शीर्ष अदालत ने ED को इस मामले की विशेष रूप से जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का निर्देश दिया और कहा कि जांच को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए।
सर्वोच्च न्यायाधीश सूर्याकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली शामिल थे, उन्होंने कहा कि मामले की गंभीरता और इसमें शामिल सार्वजनिक धन की विशाल राशि को देखते हुए जांच वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी स्तर पर जांच में ढिलाई या बाधा स्वीकार नहीं की जाएगी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अनिल अंबानी की ओर से यह आश्वासन दर्ज किया कि वह अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेंगे। यह आश्वासन उनके वकील मुकुल रोहतगी ने दिया। उन्होंने पीठ को बताया कि उनके मुवक्किल भारत में मौजूद हैं और अदालत के हर निर्देश का पालन करेंगे।
हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस आश्वासन पर आपत्ति जताते हुए पूर्व में दिए गए ऐसे ही आश्वासनों के कथित उल्लंघन का हवाला दिया। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें दर्ज करते हुए कहा कि जांच में किसी भी प्रकार की रुकावट न आए, इसके लिए आवश्यक निवारक कदम उठाए जाएंगे।
एक अहम निर्देश में सुप्रीम कोर्ट ने CBI से यह भी कहा कि वह इस बात की जांच करे कि क्या कथित फ्रॉड में बैंक अधिकारियों की मिलीभगत थी। पीठ ने कहा कि यह पता लगाना जरूरी है कि ऋण स्वीकृति और धन जारी करने की प्रक्रिया में किसी तरह की सांठगांठ, साजिश या लापरवाही हुई या नहीं।
अदालत ने CBI को निर्देश दिया कि वह बैंक अधिकारियों और अन्य संबंधित पक्षों के बीच किसी भी संभावित गठजोड़ की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच करे और कानून के तहत सभी आवश्यक कदम उठाए। पीठ ने ED और CBI की ओर से कार्रवाई में कथित देरी पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि कथित घोटाले के पैमाने को देखते हुए देरी का कोई ठोस कारण सामने नहीं आया है। यह मामला लगभग 1.78 लाख करोड़ रुपये के कथित फ्रॉड से जुड़ा बताया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों एजेंसियों को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया और संकेत दिया कि इसके बाद भी नियमित प्रगति रिपोर्ट की अपेक्षा की जाएगी।
वहीं, अनिल अंबानी और अनिल धीरूभाई अंबानी समूह की ओर से सार्वजनिक धन की हेराफेरी के आरोपों से इनकार किया गया। उनके वकीलों ने आपराधिक कार्रवाई के बजाय अन्य वैकल्पिक तरीकों से मामले की जांच का सुझाव दिया। इन दलीलों का सॉलिसिटर जनरल ने कड़ा विरोध करते हुए फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कथित तौर पर धन के डायवर्जन की बात कही गई है।
याचिका के अनुसार, रिलायंस कम्युनिकेशंस और उसकी सहयोगी कंपनियों को 2013 से 2017 के बीच स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले बैंक कंसोर्टियम से लगभग 31,580 करोड़ रुपये का कर्ज दिया गया था। फॉरेंसिक ऑडिट में कथित तौर पर जटिल लेनदेन के जरिए धन की हेराफेरी, ऋणों का एवरग्रीनिंग और संबंधित पक्षों को फंड ट्रांसफर किए जाने के आरोप सामने आए हैं।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि ऑडिट रिपोर्ट सामने आने के बावजूद SBI द्वारा लगभग पांच साल तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, जिससे यह मामला व्यापक सार्वजनिक धन के जोखिम के चलते कड़े न्यायिक पर्यवेक्षण का पात्र बनता है।
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