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नादिमार्ग नरसंहार के 23 साल पुरे, विस्थापित हिंदुओ ने लौटकर दी श्रद्धांजली

जानिए नादिमार्ग नरसंहार का काला अध्याय

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कश्मीरी पंडितों के एक समूह ने नादिमार्ग गांव का दौरा कर 23 साल पहले हुए आतंकी हमले में मारे गए 24 कश्मीरी पंडितों को श्रद्धांजलि दी। 2003 के इस नरसंहार की 23वीं बरसी के मौके पर कुछ विस्थापित कश्मीरी पंडित सोमवार(23 मार्च) को दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले के नादिमार्ग गांव लौटे। इस हमले में जान गंवाने वाले 24 निर्दोष लोगों की याद में स्थानीय लोगों ने भी उनके साथ प्रार्थना की।

कश्मीर घाटी के सबसे काले अध्यायों में से एक माने जाने वाले इस स्थल पर आयोजित कार्यक्रम में पंडित समुदाय के लोगों ने स्मृति प्रार्थनाएं कीं। पहले ऐसे आयोजन अधिकतर जम्मू तक सीमित रहते थे, लेकिन यह एक सकारात्मक बदलाव का संकेत था। हाल के वर्षों में पहली बार 23 मार्च 2003 की उस दुर्भाग्यपूर्ण रात के वास्तविक घटनास्थल पर यह स्मरण कार्यक्रम आयोजित किया गया।

गांव के खाली पड़े घर और मिटती हुई निशानियां उस भयावह हिंसा की याद दिला रही थीं, वहीं श्रद्धांजलि कार्यक्रम ने शांति का संदेश भी दिया। जिला प्रशासन और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी भी श्रद्धांजलि देने और कार्यक्रम को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए मौजूद रहे।

नादिमार्ग में क्या हुआ था?

पुलवामा जिले का नादिमार्ग गांव 2000 के दशक की शुरुआत में कश्मीरी हिंदुओं के बचे हुए आखिरी ठिकानों में से एक था। 1990 के दशक में इस्लामी उग्रवाद के कारण लाखों कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़ना पड़ा था। हालांकि, नादिमार्ग के कुछ परिवारों ने शांति की उम्मीद में वहीं रहने का फैसला किया था, लेकिन उनकी यह उम्मीद टूट गई।

23 मार्च की रात, हथियारों से लैस आतंकवादियों का एक समूह गांव में घुस आया। बाद में उनकी पहचान लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों के रूप में की गई। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के रावलकोट के निवासी और जिला कमांडर जिया मुस्तफा के नेतृत्व में आतंकियों ने सेना की वर्दी पहनकर गांववालों को धोखा दिया। सुरक्षा जांच के बहाने उन्होंने सभी पंडितों को घरों से बाहर आने का आदेश दिया।

आतंकियों ने 11 पुरुष, 11 महिलाएं और 2 बच्चों सहित 24 कश्मीरी हिंदुओं को लाइन में खड़ा किया और एक-एक कर गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। भयभीत पीड़ित दया की भीख मांग रहे थे, लेकिन मुस्लिम हमलावरों ने ‘काफिर हिंदुओ’ पर जरा भी दया नहीं दिखाई। मारे गए लोगों में 65 वर्षीय बुजुर्ग और 2 साल का मासूम बच्चा भी शामिल था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, गांव की सुरक्षा के लिए तैनात स्थानीय पुलिसकर्मियों ने अल्पसंख्यांक हिंदुओ की सुरक्षा के बजाए, नरसंहार शुरू होने से पहले गांव छोड़कर भाग जाना चुना, यह घोर विश्वासघात था।

इतने गंभीर अपराध के बावजूद न्याय मिलने में भारी देरी हुई है। इस साजिश के मास्टरमाइंड जिया मुस्तफा को 2003 में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन उसे वर्षों तक जेल में रखा गया। अक्टूबर 2021 में सुरक्षा बल उसे आतंकियों के ठिकानों की पहचान के लिए पुंछ के जंगल में ले गए, जहां मुठभेड़ में उसकी मौत हो गई। इसके अलावा, 29 मार्च 2003 को मुंबई पुलिस द्वारा मारे गए लश्कर-ए-तैयबा के तीन अन्य आतंकियों के भी इस हमले में शामिल होने का संदेह था। अप्रैल 2003 में एक और संदिग्ध आतंकी को गिरफ्तार किया गया, लेकिन अब तक कोई बड़ी सजा नहीं हो सकी है।

नादिमार्ग नरसंहार के पीड़ितों के परिजन हर साल एकत्र होकर अपने प्रियजनों को श्रद्धांजलि देते हैं और अब भी न्याय की मांग करते आ रहे हैं।

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