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वसूली केस से दाऊद के गैंगस्टर सलीम दाढ़ी को MCOCA केस में बेल !

अभियोजन ने 36 गवाहों के बयान दर्ज किए हैं, लेकिन किसी ने भी सलीम दाढ़ी के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया है।

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मुंबई की एक विशेष MCOCA (महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम) अदालत ने वर्ष 2011 में दर्ज एक वसूली मामले में गैंगस्टर सलीम पेनवाला उर्फ सलीम दाढ़ी को जमानत दे दी है। सलीम को अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के गिरोह का सदस्य और गैंगस्टर एजाज़ लकड़ावाला का करीबी बताया जाता है। अदालत ने अभियोजन पक्ष की दलीलों को असंगत मानते हुए और आरोपी के खिलाफ प्रत्यक्ष सबूतों की कमी का हवाला देते हुए जमानत मंजूर की है।

यह मामला साल 2011 में जे जे मार्ग पुलिस स्टेशन में दर्ज हुआ था। उस समय एक व्यवसायी से 50 लाख रुपये की जबरन वसूली की गई थी। इस केस में पुलिस ने पहले ही पांच अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया था, जिन पर व्यवसायी पर गोली चलाने का भी आरोप है। व्यवसायी हमले में बच गया था और बाद में कथित रूप से ‘प्रोटेक्शन मनी’ दी गई थी।

हालांकि जब लकड़ावाला को जनवरी 2020 में एक अन्य मामले में पकड़ा गया था तभी सलीम दाढ़ी को इस मामले में 2020 में गिरफ्तार किया गया। पूछताछ के दौरान लकड़ावाला ने दावा किया कि इस वसूली में सलीम दाढ़ी भी शामिल था और उसे 25 लाख रुपये दिए गए थे। हालांकि बाद में लकड़ावाला ने यह बयान वापस ले लिया और कहा कि उसे उसकी बेटी को फंसाने की धमकी देकर यह बयान दिलवाया गया था।

कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की दलील में विरोधाभास पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि सलीम दाढ़ी और लकड़ावाला का संपर्क 2019 में हुआ, तो यह साफ है कि 2011 के अपराध के दौरान दोनों का कोई संपर्क नहीं था। कोर्ट ने यह भी कहा कि अब तक अभियोजन ने 36 गवाहों के बयान दर्ज किए हैं, लेकिन किसी ने भी सलीम दाढ़ी के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया है।

अदालत ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि “यह शिकायतकर्ता का भी दावा नहीं है कि आरोपी ने किसी को धमकाया हो या किसी से पैसे लिए हों। यहां तक कि आरोपी और लकड़ावाला के बीच अपराध के समय किसी भी प्रकार का संबंध तक साबित नहीं हुआ है।” इस आधार पर अदालत ने कहा कि लकड़ावाला के बयान को छोड़कर, सलीम दाढ़ी के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं हैं, और उसे जमानत दी जाती है।

यह मामला एक बार फिर बताता है कि संगठित अपराध मामलों में पुलिस की जांच और सबूतों की प्रस्तुति में गंभीर कमियां सामने आती हैं, जिससे आरोपी को कानूनी राहत मिलती है। हालांकि यह अदालत का फैसला अभियोजन के लिए एक झटका है, लेकिन यह न्यायिक प्रणाली की निष्पक्षता और प्रमाण आधारित निर्णय प्रक्रिया को भी दर्शाता है।

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