कर्नाटक हाईकोर्ट: PFI सदस्य शाहिद खान को आतंकी फंडिंग और कट्टरपंथ के मामले में जमानत से इनकार

कोर्ट ने कहा-‘जमानत याचिका इस बात का फैसला करने का मंच नहीं है कि सभी धाराएं अंततः सिद्ध होंगी या नहीं। यह ट्रायल का विषय है, न कि मिनी-ट्रायल।’

कर्नाटक हाईकोर्ट: PFI सदस्य शाहिद खान को आतंकी फंडिंग और कट्टरपंथ के मामले में जमानत से इनकार

Karnataka High Court: PFI member Shahid Khan denied bail in terror funding and radicalization case.

कर्नाटक हाईकोर्ट ने प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़े आतंकी फंडिंग और कट्टरपंथी गतिविधियों के मामले में आरोपी शाहिद खान को जमानत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत याचिका की सुनवाई को “मिनी-ट्रायल” में नहीं बदला जा सकता और इस स्तर पर उपलब्ध सामग्री प्राथमिक दृष्टया आरोपों की पुष्टि करती है।

यह मामला 2 मई 2025 को एनआईए की विशेष अदालत द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा था। शाहिद खान 19 आरोपियों में शामिल है, जिन पर भारतीय दंड संहिता (IPC) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। आरोपियों पर IPC की धारा 153A (वैमनस्य फैलाना) और 120B (आपराधिक साजिश) समेत UAPA की धारा 13 (गैरकानूनी गतिविधि), 17 (आतंकी फंडिंग), 18, 18A (आतंकी साजिश और प्रशिक्षण शिविर), 18B (आतंकियों की भर्ती) और 22B (संगठन/ट्रस्ट द्वारा अपराध) के तहत आरोप हैं।

अदालत की टिप्पणी और आरोपों की प्रकृति

न्यायमूर्ति एच.पी. संदीश और न्यायमूर्ति वेंकटेश नाइक टी. की खंडपीठ ने अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन के अनुसार सभी 19 आरोपी PFI के नेता, सक्रिय सदस्य या जमीनी कार्यकर्ता थे। आरोप है कि उन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), NRC, हिजाब विवाद, बाबरी मस्जिद फैसले जैसे मुद्दों को लेकर असंतोष का फायदा उठाया और मुस्लिम युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा की ओर मोड़ने की साजिश रची।

अभियोजन के अनुसार, युवाओं का ब्रेनवॉश कर उन्हें संगठित किया गया, हथियारों का प्रशिक्षण दिया गया और देश में सांप्रदायिक वैमनस्य व हिंसा फैलाने के लिए हत्या या विस्फोट जैसी गतिविधियों को अंजाम देने की योजना बनाई गई। शाहिद खान, आरोपी संख्या 14, वर्ष 2019 से दावणगेरे ज़ोन में PFI का जिला अध्यक्ष बताया गया है।

बचाव पक्ष की दलीलें और अदालत का रुख

शाहिद खान के वकील ने तर्क दिया कि UAPA की धारा 18 के तहत आरोप लगाने से पहले सरकारी मंजूरी आवश्यक है, जो इस मामले में नहीं ली गई। उन्होंने यह भी कहा कि केवल PFI की सदस्यता को आतंकी कृत्य नहीं माना जा सकता और आरोपी पर ऐसा कोई अपराध नहीं है जिसमें मृत्युदंड या आजीवन कारावास का प्रावधान हो। इसके अलावा, घर से बरामद नकदी की जब्ती में UAPA की धारा 25 की प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने का भी दावा किया गया।

इस पर अदालत ने कहा कि जब्ती प्रक्रिया में किसी तरह की कमी, यदि हो भी, तो वह अधिकतम एक अनियमितता हो सकती है, जिससे अभियोजन का पूरा मामला कमजोर नहीं होता। अदालत ने टिप्पणी की, “जमानत याचिका इस बात का फैसला करने का मंच नहीं है कि सभी धाराएं अंततः सिद्ध होंगी या नहीं। यह ट्रायल का विषय है, न कि मिनी-ट्रायल।”

आरोपी पक्ष ने जांच अधिकारी की केस डायरी तलब करने की मांग भी की, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केस डायरी अदालत के संदर्भ के लिए हो सकती है, लेकिन आरोपी को इसे मांगने का कोई अधिकार नहीं है। साथ ही, सरकारी मंजूरी से जुड़ा मुद्दा भी ट्रायल के दौरान तय किए जाने योग्य बताया गया।

सभी रिकॉर्ड और सामग्री का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालत का आदेश सही था और उसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही शाहिद खान की जमानत याचिका खारिज कर दी गई और उसे न्यायिक हिरासत में ही बनाए रखने का आदेश दिया गया।

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