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टिंडर का राइट स्वाइप पड़ा महंगा; हनीट्रैप में जज को लगा 52 लाख का चूना

पुलिस द्वारा मामले की जांच जारी

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एक गुप्त सरकारी विभाग में काम करने का दावा करने वाले व्यक्ति के साथ टिंडर पर मैच होने के बाद, हरियाणा की एक महिला जज के साथ धोखाधड़ी होने का मामला सामने आया है। इस संदिग्ध हनीट्रैप घोटाले में 52 लाख रुपये से अधिक की धोखाधड़ी का आरोप है। हालांकि, इस कथित धोखाधड़ी में एक अप्रत्याशित मोड़ तब आया, जब शिकायत खुद जज ने दर्ज न कराकर, अपनी घरेलू सहायिका (कामवाली महिला) के नाम से दर्ज कराई, जिसने पुलिस को बताया कि ऑनलाइन डेटिंग ऐप के जरिए उसके साथ धोखाधड़ी हुई थी।

शिकायत के अनुसार, जज ने नवंबर में टिंडर पर आरोपी से संपर्क किया था। उस व्यक्ति ने खुद की पहचान अभिमन्यु वशिष्ठ के रूप में बताई थी। धीरे-धीरे दोनों के बीच संबंध बन गए, जिसके दौरान आरोपी ने उन्हें आकर्षक रिटर्न का लालच देकर निवेश करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद जज ने आरोपी से जुड़े बैंक खातों में 52 लाख रुपये से अधिक की राशि ट्रांसफर कर दी। जब वादा किया गया मुनाफा कभी नहीं मिला, तब धोखाधड़ी और घोटाले के आरोप सामने आए।

हालांकि, एफआईआर (FIR) खुद न्यायिक अधिकारी द्वारा दर्ज नहीं की गई थी। इसके बजाय, उनकी घरेलू सहायिका के नाम से शिकायत दर्ज कराई गई थी, जिसने दावा किया था कि ऑनलाइन डेटिंग प्लेटफॉर्म के जरिए उसके साथ धोखाधड़ी हुई थी। आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। निचली अदालत द्वारा जमानत खारिज किए जाने के बाद, उसने राहत के लिए सत्र न्यायालय (सेशन कोर्ट) का रुख किया। याचिका पर विचार करते हुए, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह लालर ने नोट किया कि लगभग सभी विवादित लेनदेन घरेलू सहायिका के खातों से नहीं, बल्कि जज के बैंक खातों से हुए थे।

अदालत ने यह टिप्पणी की कि शिकायत में असली पीड़िता की पहचान छिपी हुई दिखती है और एक जज ने खुद के नाम से सामने आने के बजाय अप्रत्यक्ष रूप से आपराधिक न्याय प्रणाली का रास्ता चुना है। न्यायाधीश ने माना कि प्रेम घोटालों (रोमांस स्कैम) के पीड़ितों को शर्मिंदगी महसूस हो सकती है, लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसी चिंताओं के कारण पारदर्शी और पूरी जांच की आवश्यकता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस आदेश में जांच की महत्वपूर्ण कमियों पर भी प्रकाश डाला गया। जिन टिंडर चैट्स के जरिए वे दोनों कथित तौर पर जुड़े थे, वे चैट्स भी जांच अधिकारियों को नहीं मिले, और न ही जज और आरोपी के बीच की पूरी व्हाट्सएप बातचीत हासिल की जा सकी। कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) भी एकत्र नहीं किए गए थे।

जानकारी छिपाने के लिए अदालत ने आरोपी को भी फटकार लगाई। अदालत ने नोट किया कि उसने अपने खुद के जवाबों को हटाकर अधिकारी द्वारा भेजे गए चुनिंदा संदेश ही प्रस्तुत किए थे और अपने फोन का एक्सेस नहीं दिया था। इस व्यवहार को ‘लुका-छिपी’ बताते हुए, अदालत ने कहा कि आरोपी की हरकतों ने जांच को और जटिल बना दिया है। चूंकि जांच अधूरी है और महत्वपूर्ण सबूत जुटाए जाने बाकी हैं, इसलिए अदालत ने जमानत मंजूर नहीं की।

अदालत ने जांच अधिकारियों को टिंडर और व्हाट्सएप के पूरे रिकॉर्ड हासिल करने, दोनों के बीच कथित मुलाकातों का सत्यापन करने, फंड ट्रांसफर में शामिल संस्थाओं की जांच करने और आरोपी के मोबाइल फोन का फोरेंसिक विश्लेषण तेजी से करने का निर्देश दिया।

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