-लेखक: विवेक वाई. केलकर
आंकड़े एक ऐसी कहानी कहते हैं, जिसकी कल्पना एक दशक पहले करना मुश्किल था। भारत के कभी बेहद अस्थिर रहे “रेड कॉरिडोर” में अब वामपंथी उग्रवाद की भौगोलिक पकड़ तेज़ी से सिमटी है, हिंसा घटी है और राज्य उन इलाकों तक पहुंचा है, जहां कभी उसकी मौजूदगी बेहद सीमित थी। इस बदलाव की वजह सिर्फ हथियारों की ताकत नहीं है, बल्कि एक ऐसी विकास रणनीति का लगातार इस्तेमाल है, जिसने उग्रवाद की आर्थिक और राजनीतिक जमीन को बदल दिया है।
अपने चरम पर, साल 2010 में माओवादी हिंसा में हर साल 1,100 से अधिक लोगों की मौत होती थी। आज संघर्ष के पैमाने और तीव्रता, दोनों में तेजी से गिरावट आई है, जबकि प्रभावित जिलों की संख्या 2013 के 126 से घटकर 2024 में सिर्फ 38 रह गई है। यह गिरावट उन क्षेत्रों में एक संरचनात्मक बदलाव को दिखाती है, जहां कभी उग्रवाद अलगाव, गरीबी और राज्य की गैरमौजूदगी के सहारे फलता-फूलता था।
इस बुनियादी ढांचा विस्तार के साथ राज्य क्षमता में भी बड़ा इजाफा हुआ है। प्रभावित इलाकों में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की 574 से अधिक कंपनियां तैनात की गई हैं, जिन्हें बड़े वित्तीय आवंटनों का सहारा मिला है। सूत्रों के मुताबिक, 2014 से अब तक सुरक्षा संबंधी व्यय योजना के तहत 3,400 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए गए हैं, जबकि स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम के तहत 1,700 करोड़ रुपये दिए गए हैं।
इसी धन से सैकड़ों फोर्टिफाइड पुलिस थाने बनाए गए। इसके अलावा 1,200 करोड़ रुपये से अधिक की अतिरिक्त राशि केंद्रीय एजेंसियों के संचालन को मजबूत करने में लगाई गई है। इन निवेशों ने सुरक्षा उपस्थिति का एक घना जाल तैयार किया है, लेकिन अहम बात यह है कि अब यह ढांचा विकास के फ्रेमवर्क में समाया हुआ है। स्थानीय आबादी को इस सुरक्षा ढांचे में शामिल करना भी उतना ही अहम है। 1,100 से अधिक आदिवासी युवाओं की भर्ती बस्तरिया बटालियन जैसी विशेष इकाइयों में की गई है, जिससे रोजगार सृजन को सुरक्षा उद्देश्यों के साथ जोड़ा गया है।
सुरक्षा ढांचे को विकास पहुंचाने के माध्यम के रूप में भी इस्तेमाल किया गया है। पुलिस कैंप अब सिर्फ ऑपरेशनल बेस नहीं रह गए हैं, बल्कि वे शासन के नोड बन गए हैं। इन्हीं कैंपों से नई बस सेवाएं शुरू की गई हैं, जिन्होंने आजादी के बाद पहली बार दर्जनों दुर्गम गांवों को जोड़ा है। 73 लाइब्रेरी खोलने जैसी सामुदायिक पहलों ने सामान्य नागरिक जीवन की वापसी का संकेत दिया है।
जमीन पर दिख रहे ये छोटे-छोटे बदलाव अहम आर्थिक संकेत भी देते हैं। आंतरिक आदिवासी इलाकों में दोपहिया वाहनों की बिक्री बढ़कर 5,000 से अधिक यूनिट तक पहुंच गई है, जो बढ़ती आय और फैलते स्थानीय बाजारों की तरफ इशारा करती है। गढ़चिरौली में बड़े पैमाने पर औद्योगिक निवेश की संभावना, जिसमें 1.5 लाख रोजगार देने की क्षमता वाले बड़े स्टील हब का विकास भी शामिल है, संरचनात्मक बदलाव की शुरुआती आहट देती है। यही वे बुनियादी ईंटें हैं, जिन पर निर्वाह-आधारित अर्थव्यवस्था से विविध और बाजार-सम्बद्ध व्यवस्था की ओर संक्रमण खड़ा होता है।
इन तमाम हस्तक्षेपों का संयुक्त असर हिंसा के बदलते पैटर्न में दिखता है। जैसे-जैसे कनेक्टिविटी और राज्य की मौजूदगी बढ़ी है, वैसे-वैसे उग्रवादियों की गतिविधि का दायरा सिकुड़ा है। हालिया वर्षों के आंकड़े एक साफ उलटा रिश्ता दिखाते हैं। जिन इलाकों में सड़क, बुनियादी ढांचे और दूरसंचार का तेज विस्तार हुआ, वहीं हिंसक घटनाओं में भी तेज गिरावट दर्ज की गई। विकास आधारित हस्तक्षेप अब अवसर संरचनाओं और प्रोत्साहन तंत्र, दोनों को बदलकर उग्रवादी प्रभाव को पीछे धकेल रहे हैं।
संगठनात्मक स्तर पर भी माओवादी आंदोलन इस नए माहौल के साथ खुद को ढालने में संघर्ष करता दिखा है। नेतृत्व का क्षरण गंभीर रहा है। साल 2025 के अंत तक उसकी केंद्रीय नेतृत्व संरचना का सिर्फ एक छोटा हिस्सा ही सक्रिय रह गया, और संगठन स्थानीय तथा प्रतिक्रियात्मक इकाइयों तक सिमटता गया। अहम बात यह है कि यह गिरावट उन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में आए सकारात्मक बदलावों से जुड़ी है, जिन्होंने कभी भर्ती और लामबंदी को ताकत दी थी।
विकास की राजनीति के नजरिए से सबसे बड़ा बदलाव राज्य की वैधता की प्रकृति में आया है। जिन इलाकों में कभी राज्य को गैरमौजूद या अविश्वसनीय माना जाता था, वहीं अब वह सड़कों, कनेक्टिविटी, कल्याण और रोजगार जैसे ठोस फायदों से जुड़ता जा रहा है। यह बदलाव एक बड़े सिद्धांत को सामने लाता है। वैधता सिर्फ अधिकार से नहीं, बल्कि डिलीवरी से बनती है। रोजमर्रा की आर्थिक जिंदगी में खुद को स्थापित करके राज्य ने उपेक्षा और बहिष्कार पर टिके उग्रवादी नैरेटिव को कमजोर करना शुरू किया है।
इसका मतलब यह नहीं है कि चुनौती पूरी तरह खत्म हो गई है। जमीन के अधिकार, वन शासन और अनुसूचित क्षेत्रों में सुरक्षात्मक कानूनों के क्रियान्वयन से जुड़ी स्थायी समस्याएं अब भी तनाव पैदा करती हैं। फिर भी अब तक जो नतीजे सामने आए हैं, वे एक शांत लेकिन गहरे बदलाव की कहानी कहते हैं। जो गांव कभी राज्य की पहुंच से बाहर थे, वे अब सड़कों और मोबाइल नेटवर्क से जुड़े हैं। स्थानीय अर्थव्यवस्थाएं धीरे-धीरे जाग रही हैं। “रेड कॉरिडोर” अब कनेक्टिविटी, बाजार और संस्थानों के जरिए बदल रहा है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब विकास को व्यवस्थित ढंग से लागू किया जाता है, तो वह वहां भी सफल हो सकता है, जहां सिर्फ बल प्रयोग काफी नहीं था।
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