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Tuesday, October 27, 2026
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नौसेना प्रमुख बोले, मानव मस्तिष्क पर भरोसा रखें, सीखना कभी न छोड़ें! 

नौसेना प्रमुख ने कहा कि मानव मस्तिष्क ही सबसे बड़ा हथियार है। तकनीक सूचना, गति और सटीकता प्रदान कर सकती है, लेकिन वह बुद्धिमत्ता और विवेक का स्थान नहीं ले सकती।

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ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी चेन्नई की पासिंग आउट परेड को संबोधित करते हुए नौसेना प्रमुख ने युवा सैन्य अधिकारियों से कहा कि बदलती चुनौतियों के दौर में उन्हें तीन वास्तविकताओं को समझना, स्वीकार करना और उनके अनुरूप खुद को ढालना होगा। उन्होंने भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए पांच महत्वपूर्ण विचार भी साझा किए।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि मानव मस्तिष्क ही सबसे बड़ा हथियार है। तकनीक सूचना, गति और सटीकता प्रदान कर सकती है, लेकिन वह बुद्धिमत्ता और विवेक का स्थान नहीं ले सकती। उन्होंने अधिकारियों को सलाह दी कि वे अपनी सोच को किसी एल्गोरिद्म या तकनीक के भरोसे न छोड़ें, बल्कि समस्याओं का स्वयं विश्लेषण करें, अपनी धारणाओं पर सवाल उठाएं और हर दिन अपने निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत बनाएं।

उन्होंने कहा कि अंततः बढ़त उसी को मिलेगी, जो अपने प्रतिद्वंद्वी से बेहतर सोचेगा। मानव मस्तिष्क की शक्ति की कोई सीमा नहीं होती।

नौसेना प्रमुख ने अपने दूसरे संदेश में अधिकारियों को जीवनभर विद्यार्थी बने रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि सैन्य पेशेवरों को लगातार अपने ज्ञान और कौशल को अपडेट करते रहना चाहिए। पद या अनुभव को कभी भी सतत सीखने का विकल्प नहीं बनने देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जीवन में एक समय ऐसा आएगा जब कोई सैनिक अपने अधिकारी की ओर देखकर पूछेगा, ”अब हमें क्या करना चाहिए?” उस समय कोई पाठ्यपुस्तक, पावरपॉइंट प्रस्तुति या चैटजीपीटी मदद के लिए नहीं आएगा। उस चुनौतीपूर्ण क्षण में अधिकारी का ज्ञान, जागरूकता और अध्ययन ही उसे सही निर्णय लेने में सक्षम बनाएगा।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि प्रशिक्षण, निर्णय क्षमता, साहस और चरित्र ही असली ताकत होते हैं, इसलिए अधिकारियों को पेशेवर दक्षता बढ़ाने पर निरंतर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने पढ़ने, इतिहास का अध्ययन करने, तकनीक को समझने, दुश्मन की रणनीतियों से परिचित रहने और अपने अधीनस्थों के विकास में समय और ऊर्जा लगाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि सीखने की प्रक्रिया कभी नहीं रुकनी चाहिए।

अपने तीसरे संदेश में नौसेना प्रमुख ने कहा कि साहस एक मांसपेशी की तरह होता है, जो हर बार उपयोग करने पर और मजबूत होती जाती है। चाहे वह शारीरिक साहस हो या नैतिक साहस, अक्सर इसका अर्थ अपनी मान्यताओं और सिद्धांतों पर अकेले खड़े रहने की क्षमता से होता है।

उन्होंने कहा कि संकट की घड़ी में साहस अचानक प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह समय के साथ विकसित होता है और रोजमर्रा के छोटे-छोटे निर्णयों तथा कार्यों के माध्यम से व्यक्तित्व का हिस्सा बनता है, इसलिए अधिकारियों को अपने चरित्र और साहस को निरंतर मजबूत करते रहना चाहिए, ताकि कठिन परिस्थितियों में वे सही नेतृत्व प्रदान कर सकें।

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