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Monday, July 20, 2026
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इंस्टाग्राम से संपर्क, टेलीग्राम पर ब्रेनवॉश, क्रिप्टो से फंडिंग

NIA ने खोला डिजिटल आतंकवाद का नया राज

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राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की हालिया कार्रवाइयों और जुलाई में देशभर के 20 से अधिक ठिकानों पर हुई छापामारी से आतंकवाद के एक नए पैटर्न का खुलासा हुआ है। जांच एजेंसियों ने पाया है कि आतंकी अब युवाओं को फंसाने के लिए एक सुनियोजित थ्री-एप मॉडल का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस रणनीति के तहत सबसे पहले इंस्टाग्राम जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से संभावित युवाओं से संपर्क साधा जाता है। इसके बाद, उन्हें टेलीग्राम जैसे सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड ऐप पर ले जाकर उनका ब्रेनवॉश किया जाता है। अंततः, इस पूरी आतंकी गतिविधि को अंजाम देने के लिए फंडिंग क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से की जाती है। यह पूरी प्रक्रिया विदेशी हैंडलर्स, मल्टी-लेयर्ड वर्चुअल नेटवर्क और आधुनिक एआई टूल्स की मदद से संचालित की जा रही है।

पाकिस्तान या अफगानिस्तान जाकर ट्रेनिंग

जांच में यह भी सामने आया है कि सोशल मीडिया पर शुरुआती संपर्क के बाद युवाओं को टेलीग्राम के प्राइवेट या क्लोज्ड ग्रुप्स में जोड़ा जाता है। इन ग्रुप्स में शुरुआत में वैचारिक सामग्री परोसी जाती है, जो धीरे-धीरे हिंसक रूप ले लेती है। यहीं पर युवाओं को आईईडी बनाने, हथियार जुटाने और पाकिस्तान या अफगानिस्तान जाकर ट्रेनिंग लेने के निर्देश दिए जाते हैं। सुरक्षा एजेंसियों की नजर से बचने के लिए ये आतंकी ऑटो-डिलीट चैट, कोड वर्ड्स, फर्जी प्रोफाइल, बर्नर फोन और वीपीएन का व्यापक इस्तेमाल करते हैं ताकि उनकी असल पहचान छिपी रहे। उदाहरण के तौर पर, अल-हकीम शुकर जैसे सोशल मीडिया हैंडल से ऐसे कई महत्वपूर्ण निर्देश प्रसारित किए गए थे।

एनआईए की विस्तृत जांच में तीन प्रमुख मॉड्यूल्स तमिलनाडु, विजयवाड़ा और मंगलुरु के पुख्ता सबूत मिले हैं। तमिलनाडु मॉड्यूल के तहत आरोपियों ने इस्लामिक स्टेट और ब्लैक फ्लैग सोल्जर्स के नाम से व्हाट्सएप तथा टेलीग्राम पर ग्रुप बनाए थे, जहां ‘नाशिदा-33’ चैनल से हिंसक कंटेंट डाउनलोड किया जाता था। जून में अरबी भाषा सिखाने के बहाने भी युवाओं को जोड़ने का प्रयास किया गया।

आईईडी बनाने की ट्रेनिंग

वहीं, विजयवाड़ा मॉड्यूल में अल-हकीम शुकर के जरिए संपर्क कर एक आरोपी को भारत को इस्लामिक स्टेट बनाने और पाक-अफगानिस्तान में ट्रेनिंग के लिए संदेश भेजे गए थे। इस मॉड्यूल ने बेनएक्स डॉट कॉम नाम से भी एक ग्रुप बनाया था। इसके अलावा, मंगलुरु केस में कर्नल नाम के एक विदेशी हैंडलर ने विकर और टेलीग्राम के जरिए आईईडी बनाने की ट्रेनिंग दी थी, जबकि बाइनेंस और म्यूल अकाउंट्स का उपयोग कर क्रिप्टो फंडिंग की गई थी।

आतंकियों के निशाने पर 18 से 30 वर्ष के युवा

इन आतंकी मॉड्यूल्स का मुख्य लक्ष्य युवाओं की भर्ती करना, उनका ब्रेनवॉश करना, आतंकी गतिविधियों के लिए फंड जुटाना और जिहाद के जरिए शरिया कानून लागू करना है। जांच एजेंसियों के लिए सबसे चिंताजनक बात यह है कि आतंकियों के निशाने पर मुख्य रूप से 18 से 30 वर्ष की आयु के युवा हैं। इस जाल में केवल बेरोजगार ही नहीं फंस रहे, बल्कि इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्रों से लेकर ड्राइवर व अन्य शिक्षित युवाओं को भी बड़ी संख्या में निशाना बनाया गया है।

आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले कुछ वर्षों में आतंकवाद के इस डिजिटल मॉडल में चिंताजनक तेजी आई है। वर्ष 2015 से 2020 के बीच आतंकी गतिविधियों में डिजिटल माध्यमों की हिस्सेदारी 30-40 प्रतिशत से भी कम थी और सालाना केवल 10 से 20 मामले ही सामने आते थे। हालांकि, 2021 से 2026 के बीच इन मामलों में भारी वृद्धि दर्ज की गई है। अकेले वर्ष 2025 में एनआईए ने 55 नए मामले दर्ज कर 276 लोगों को गिरफ्तार किया है। वहीं, जुलाई 2026 की एक ही कार्रवाई के दौरान 11 आरोपियों सहित एक नाबालिग को पकड़ा गया है।

इस बदलते परिदृश्य पर भारत सरकार के पूर्व सुरक्षा सचिव और आईबी के पूर्व विशेष निदेशक यशोवर्धन झा आजाद का स्पष्ट मानना है कि साइबर आतंकवाद और डिजिटल गैंगस्टर अब एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। एक तरफ आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन पढ़े-लिखे युवाओं को कट्टरपंथ की ओर धकेलने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म, एन्क्रिप्टेड ऐप्स और क्रिप्टोकरेंसी का सहारा ले रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, देश-विदेश में बैठे माफिया और गैंगस्टर भी इन्हीं साइबर तकनीकों के सहारे भारत सहित कई देशों में रंगदारी का नेटवर्क चला रहे हैं। आतंकवाद और संगठित अपराध का यह नया डिजिटल स्वरूप बेहद खतरनाक है और सरकार को इन दोनों ही मोर्चों पर एक साथ और समान गंभीरता से लड़ना होगा।

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