अमेरिका की कांग्रेस में पेश किए गए एक नए विधेयक ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पुरानी महत्वाकांक्षा को फिर से सुर्खियों में ला दिया है, जिसके तहत वह ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्ज़ा लाना चाहते हैं। रिपब्लिकन पार्टी के एक सांसद द्वारा पेश किए एक विधेयक के प्रस्ताव का उद्देश्य ट्रंप को ग्रीनलैंड के विलय और भविष्य में उसे अमेरिका का राज्य बनाने के लिए कानूनी अधिकार देना है। इस विधेयक में आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा, चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव, नाटो से जुड़े निहितार्थ और ट्रंप की बार-बार की गई अपीलों का हवाला दिया गया है।
दरअसल ग्रीनलैंड डेनमार्क के साम्राज्य के भीतर एक स्वायत्त क्षेत्र है और आर्कटिक में इसकी भौगोलिक स्थिति रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जाती है। जलवायु परिवर्तन के कारण नए समुद्री मार्ग खुलने और प्राकृतिक संसाधनों की बढ़ती अहमियत के चलते यह द्वीप वैश्विक शक्तियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। अमेरिका की वहां पहले से सैन्य मौजूदगी है, लेकिन ट्रंप का तर्क रहा है कि केवल सैन्य अड्डा काफी नहीं है और चीन या रूस के प्रभाव को रोकने के लिए ग्रीनलैंड को कब्जाना जरुरी है।
‘ग्रीनलैंड एनेक्सेशन एंड स्टेटहुड एक्ट’ में क्या है प्रस्ताव
12 जनवरी को फ्लोरिडा से रिपब्लिकन प्रतिनिधि रैंडी फाइन ने दो पन्नों का ‘ग्रीनलैंड एनेक्सेशन एंड स्टेटहुड एक्ट’ विधेयक पेश किया। इस विधेयक के अनुसार, “राष्ट्रपति को यह अधिकार होगा कि वह डेनमार्क के साम्राज्य के साथ बातचीत सहित आवश्यक कदम उठाएं, ताकि ग्रीनलैंड को अमेरिका का क्षेत्र बनाया जा सके।” इसके साथ ही, यदि ग्रीनलैंड को राज्य का दर्जा देने की प्रक्रिया शुरू होती है तो कांग्रेस से त्वरित मंजूरी का रास्ता भी इसमें सुझाया गया है।
फाइन ने सोशल मीडिया पर लिखा, “यह बहुत बड़ी खबर है! आज मुझे गर्व है कि मैं ग्रीनलैंड एनेक्सेशन एंड स्टेटहुड एक्ट पेश कर रहा हूं, जो राष्ट्रपति को ग्रीनलैंड को संघ में शामिल करने के लिए जरूरी रास्ते तलाशने की अनुमति देता है।” फाइन का दावा है कि आर्कटिक में बढ़ते विदेशी प्रभाव के बीच ग्रीनलैंड पर नियंत्रण अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम है। फाइन ने कहा, “जो ग्रीनलैंड को नियंत्रित करता है, वही प्रमुख आर्कटिक शिपिंग मार्गों और अमेरिका की सुरक्षा संरचना को नियंत्रित करता है।”
उन्होंने यह भी कहा, “अमेरिका अपने भविष्य को उन व्यवस्थाओं के हाथ में नहीं छोड़ सकता जो हमारे मूल्यों से नफरत करती हैं और हमारी सुरक्षा को कमजोर करना चाहती हैं।” फाइन का दावा है कि ट्रंप और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो दोनों ग्रीनलैंड को हासिल करने के पक्ष में हैं। उन्होंने कहा, “मेरा बिल इस सोच को हकीकत में बदलता है और अगले सौ सालों के लिए अमेरिका को बढ़त दिलाएगा।”
हालांकि, इस विधेयक के पारित होने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी कई नेता किसी संप्रभु क्षेत्र को बल या दबाव के जरिए हासिल करने के विचार के विरोध में हैं। दोनों प्रमुख दलों के सांसदों ने ग्रीनलैंड जैसे नाटो सदस्य देश के हिस्से पर आक्रमण की बात को खारिज किया है, क्योंकि ऐसा कदम नाटो के अनुच्छेद 5 को सक्रिय कर सकता है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सख्त प्रतिक्रिया
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नील्सन ने कोपेनहेगन में संयुक्त रूप से ट्रंप की मांगों का विरोध किया। फ्रेडरिक्सन ने ग्रीनलैंडवासियों से कहा, “प्रिय ग्रीनलैंडवासियों, आपको जानना चाहिए कि हम आज एक साथ खड़े हैं, कल भी खड़े रहेंगे और आगे भी ऐसा ही करेंगे।” नील्सन ने साफ कहा, “अगर हमें अमेरिका और डेनमार्क में से चुनना पड़ा, तो हम डेनमार्क, नाटो और यूरोपीय संघ को चुनेंगे।” हालांकि ट्रंप ने इन बयानों को खारिज करते हुए कहा की यह उनकी समस्या है। वहीं ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री नील्सन पर टिप्पणी करते हुए बोले, “मैं उनसे सहमत नहीं हूं। मुझे नहीं पता वह कौन हैं।”
ग्रीनलैंड के लोगों की चिंता
ग्रीनलैंड की मंत्री नाजा नाथानिएल्सन ने ट्रंप के बयानों को भयावह बताया। उन्होंने कहा, “लोग सो नहीं पा रहे हैं, बच्चे डरे हुए हैं, और यह मुद्दा हर चीज़ पर हावी हो गया है।” उन्होंने जोर देकर कहा, “दूसरों के लिए यह ज़मीन का टुकड़ा हो सकता है, लेकिन हमारे लिए यह घर है।”
इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ अमेरिका-डेनमार्क संबंधों में तनाव बढ़ाया है, बल्कि नाटो के भीतर भी असहजता पैदा कर दी है।
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