ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीति और नए टैरिफ ऐलानों के बाद यूरोपीय संघ (EU) ने अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते पर बातचीत रोक दी है। इस फैसले ने जुलाई में हुए यूरोप–अमेरिका व्यापारिक समझौते को संकट में डाल दिया है और ट्रांसअटलांटिक आर्थिक रिश्तों को लेकर नई अनिश्चितता पैदा कर दी है।
यूरोपीय संघ ने यह कदम ट्रंप ने डेनमार्क सहित कई यूरोपीय देशों पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की और इसे ग्रीनलैंड को खरीदने की अपनी इरादे के बात उठाया है। पिछले साल जुलाई में उनके और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डर लेयेन के बीच इस व्यापारिक युद्ध पर विराम लगाने की सहमति बनी थी। उस समझौते के तहत अमेरिकी टैरिफ को EU उत्पादों पर 15 प्रतिशत पर स्थिर रखा गया था, जबकि यूरोपीय संघ ने अमेरिकी निर्यात पर शुल्क हटाने पर सहमति जताई थी।
ग्रीनलैंड को लेकर वाशिंगटन के दबाव के बाद इस समझौते पर बनी गति अचानक थम गई। ट्रंप ने इस सप्ताह आर्कटिक द्वीप ग्रीनलैंड में सीमित सैन्य तैनाती करने वाले यूरोपीय देशों पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की है। ट्रंप ने कहा कि यदि 1 जून तक कोई समझौता नहीं हुआ, तो यह टैरिफ बढ़कर 25 प्रतिशत हो जाएगा और तब तक लागू रहेगा जब तक ग्रीनलैंड की पूर्ण और संपूर्ण खरीद के लिए कोई समझौता नहीं हो जाता।
यूरोपीय नेताओं का कहना है कि ग्रीनलैंड में सैनिकों की तैनाती ट्रंप की ही चेतावनियों के बाद की गई थी, जिसमें उन्होंने उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों का जिक्र किया था। यूरोप ने साफ किया कि यह कदम अमेरिका को उकसाने के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा चिंताओं के मद्देनज़र उठाया गया था।
यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने चेतावनी दी कि अगर टैरिफ लागू रहते हैं, तो यूरोपीय संघ एक “संयुक्त प्रतिक्रिया” देगा। यूरोपीय संसद के भीतर भी घटनाक्रम तेज़ी से बदला। कई राजनीतिक समूहों ने व्यापार समझौते की पुष्टि की प्रक्रिया रोक दी। यूरोपीय पीपल्स पार्टी (EPP) के अध्यक्ष मैनफ्रेड वेबर ने कहा कि ग्रीनलैंड पर दबाव बनाने के लिए टैरिफ को हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाने की स्थिति में संसद समर्थन नहीं दे सकती।
उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा, “EPP EU–US व्यापार समझौते का समर्थन करता है, लेकिन मौजूदा हालात में इसकी मंज़ूरी संभव नहीं है। अमेरिकी उत्पादों के लिए शून्य-टैरिफ व्यवस्था को फिलहाल रोकना होगा।” इस प्रक्रिया से जुड़े यूरोपीय सांसद सिगफ्राइड मुरेआन ने कहा कि हालिया तनाव से पहले वोटिंग लगभग तय थी। उन्होंने लिखा, “हम बहुत जल्द EU–US व्यापार समझौते की पुष्टि करने वाले थे। नए हालात में यह फैसला टालना पड़ेगा।”
कुछ नेताओं ने अब जवाबी कार्रवाई की तैयारी की बात कही है। रिन्यू यूरोप की ट्रेड समन्वयक कारिन कार्ल्सब्रो ने कहा कि संसद इस सप्ताह समझौते को हरी झंडी नहीं देगी और EU को ट्रंप के टैरिफ दबाव का जवाब देने के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने पोलिटिको से कहा, “बुधवार को होने वाले फैसले में यूरोपीय संसद के आगे बढ़ने की कोई संभावना नहीं है। इसके बजाय EU को राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ हमलों का जवाब देने की तैयारी करनी चाहिए।”
कार्ल्सब्रो ने संकेत दिया कि EU जवाबी टैरिफ या ‘एंटी-कोएर्शन इंस्ट्रूमेंट’, यानि ‘बाज़ूका’ का इस्तेमाल कर सकता है। इसके तहत निवेश, सार्वजनिक खरीद और बौद्धिक संपदा संरक्षण पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डर लेयेन ने चेतावनी दी कि ग्रीनलैंड से जुड़े टैरिफ ट्रांसअटलांटिक रिश्तों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। उन्होंने कहा, “टैरिफ ट्रांसअटलांटिक संबंधों को कमजोर करते हैं और खतरनाक गिरावट का जोखिम पैदा करते हैं।” उन्होंने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के प्रति EU की पूर्ण एकजुटता दोहराई और कहा कि संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता अंतरराष्ट्रीय कानून के मूल सिद्धांत हैं।
फॉन डर लेयेन ने यह भी कहा कि EU संवाद के लिए प्रतिबद्ध है और डेनमार्क तथा अमेरिका के बीच शुरू हुई बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। बता दें की इससे जुलाई का समझौता भी खतरें में पड़ा हुआ है, जिसके तहत EU ने 750 अरब डॉलर की अमेरिकी ऊर्जा खरीदने और अमेरिका में 600 अरब डॉलर का निवेश बढ़ाने का वादा किया था। उस समय ट्रंप ने इसे अब तक का सबसे बड़ा समझौता बताया था, जबकि फॉन डर लेयेन ने इसे EU–US व्यापार में स्थिरता लाने वाला करार दिया था।
ट्रंप ने कहा है कि 1 फरवरी से लागू होने वाले 10 प्रतिशत टैरिफ डेनमार्क, स्वीडन, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, फिनलैंड, नॉर्वे और नीदरलैंड्स पर लागू होंगे और तब तक बने रहेंगे, जब तक ग्रीनलैंड की पूर्ण और संपूर्ण खरीद पर सहमति नहीं बन जाती। ग्रीनलैंड को अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम बताते हुए ट्रंप बार-बार कह चुके हैं कि अमेरिका को इस द्वीप पर नियंत्रण चाहिए, यह दावा करते हुए कि विश्व शांति दांव पर है और चीन व रूस की कथित रुचि इसका कारण है।
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