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Wednesday, April 22, 2026
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सत्ता संभालते ही घिरे नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह; छात्र संघ प्रतिबंध और नीतियों के खिलाफ देशभर में विरोध

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नेपाल में नई सरकार के गठन के कुछ ही हफ्तों बाद प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ असंतोष तेजी से बढ़ता जा रहा है। दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में आई सरकार अब देशभर में फैलते विरोध प्रदर्शनों का सामना कर रही है, जो राजधानी काठमांडू से लेकर अन्य प्रमुख शहरों तक पहुंच चुके हैं।

प्रदर्शनकारियों ने देश के प्रशासनिक केंद्र सिंह दरबार तक मार्च किया, जहां छात्रों, राजनीतिक दलों और आम नागरिकों ने सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई है। विरोध के मुख्य कारणों में छात्र संघों को समाप्त करने का निर्णय, भारत से आने वाले सामान पर नया कस्टम शुल्क और गृह मंत्री के खिलाफ लगे आरोप शामिल हैं।

सरकार द्वारा भारत से 100 रुपये से अधिक मूल्य के सामान पर अनिवार्य कस्टम ड्यूटी लगाने का फैसला व्यापक असंतोष का कारण बना है। सीमा क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का कहना है कि वे रोजमर्रा की आवश्यकताओं के लिए भारत पर निर्भर रहते हैं, ऐसे में यह फैसला उन पर आर्थिक बोझ बढ़ाने वाला है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार ने इस नीति को लागू करते समय स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों की अनदेखी की है।

छात्र संगठनों ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उनका आरोप है कि सरकार ने राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संघों को नजरअंदाज या खत्म किया जा रहा है। छात्र नेताओं ने इसे दमनकारी नीति करार देते हुए कहा कि सरकार संवाद से बच रही है। देशभर में हजारों छात्र सड़कों पर उतर आए हैं और कई जगहों पर स्कूल यूनिफॉर्म में छात्रों को तख्तियां लेकर विरोध करते देखा गया, जिससे आंदोलन का दायरा व्यापक होता दिख रहा है।

इस बीच, गृह मंत्री सुदन गुरूंग के खिलाफ लगे वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों ने भी स्थिति को और जटिल बना दिया है। उन पर आय से अधिक संपत्ति रखने और संदिग्ध वित्तीय लेनदेन में शामिल होने के आरोप हैं। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स में कुछ दस्तावेजों का हवाला देते हुए विवादित संस्थाओं से जुड़े निवेश और शेयरहोल्डिंग की बात सामने आई है, जिसके बाद विपक्ष और नागरिक संगठनों ने उनके इस्तीफे की मांग शुरू की है।

लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बीच बालेन शाह सरकार पर कई मोर्चों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। आर्थिक नीतियों को लेकर असंतोष, छात्रों का विरोध और सरकार के भीतर कथित अनियमितताओं के आरोप अब एक व्यापक राजनीतिक चुनौती का रूप ले चुके हैं।

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