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2030 तक रूस को 1.1 करोड़ श्रमिकों की जरूरत; भारत के श्रमिक बनते जा रहें रूस की आवश्यकता

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रूस देश की जनसंख्या में कमतरी के चलते अभूतपूर्व श्रम संकट का सामना कर रहा है। बदलती जनसांख्यिकी और यूक्रेन युद्ध के प्रभाव के चलते देश को इस दशक के अंत तक करीब 1.1 करोड़ अतिरिक्त श्रमिकों की आवश्यकता है। लंबे समय तक मध्य एशिया के देशों से आने वाले प्रवासी श्रमिकों पर निर्भर रहने के बाद अब रूसी नियोक्ता भारत सहित दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों की ओर रुख कर रहे हैं।

दिसंबर में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नई दिल्ली यात्रा के दौरान भारत और रूस के बीच अस्थायी श्रम प्रवासन की प्रक्रियाओं को सरल बनाने के उद्देश्य से एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जा रहें थे उस समय रूस की घटती जनसंख्या और श्रमिकों की जरुरत का यह मुद्दा प्रमुखता से उठा था। इस समझौते से पहले ही रूस द्वारा भारतीयों को जारी किए गए रोजगार परमिट में तेज़ बढ़ोतरी देखी गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2021 में जहां भारतीयों को करीब 5,000 कार्य परमिट मिले थे, वहीं पिछले साल यह संख्या बढ़कर 56,000 से अधिक हो गई। 2025 में विदेशियों को दिए गए कुल कार्य परमिट 2.40 लाख से ऊपर पहुंच गए, जो कम से कम 2017 के बाद का उच्चतम स्तर है।

हालांकि तुर्कमेनिस्तान जैसे पूर्व सोवियत गणराज्यों से भी परमिट बढ़े हैं, लेकिन विदेशी श्रम में वृद्धि का बड़ा हिस्सा भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका और चीन जैसे दूरस्थ देशों से आ रहा है। इस साल भारत और दक्षिण एशिया के अन्य देशों के श्रमिकों ने रूसी शहरों में बर्फ हटाने के नगर निगम के काम संभालने शुरू किए हैं। इसके अलावा वे निर्माण स्थलों, रेस्तरां और अन्य शहरी सेवाओं में भी काम कर रहे हैं।

मॉस्को स्थित भर्ती एजेंसी ‘इंट्रुड’ की संचालन निदेशक एलेना वेल्याएवा ने कहा, “हम रूसी श्रम बाजार में एक वास्तविक टेक्टोनिक बदलाव देख रहे हैं।” दो साल पहले स्थापित यह एजेंसी अब श्रीलंका और म्यांमार में भी संभावित श्रमिकों की तलाश कर रही है। एजेंसी ने रूसी एसोसिएशन ऑफ वेल्डर्स के साथ मिलकर चेन्नई में वेल्डरों के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र भी स्थापित किया है।

रूस में बेरोजगारी दर करीब 2 प्रतिशत है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे कम में से एक है। 1990 के दशक से जारी जनसंख्या संकट ने समस्या को और गहरा कर दिया है। यहां लगभग एक चौथाई आबादी सेवानिवृत्ति आयु की है। यूक्रेन युद्ध के कारण हालात और बिगड़े हैं। युद्ध से जुड़े उद्योगों में श्रमिकों के स्थानांतरण और अनुमानित 5 से 8 लाख कामकाजी उम्र के रूसियों के देश छोड़ने से नागरिक क्षेत्रों में भारी कमी पैदा हो गई है।

मुंबई स्थित एंबे इंटरनेशनल के निदेशक अमित सक्सेना ने कहा, “रूस उन देशों की सूची में सबसे नया नाम है जो भारतीयों को रोजगार दे रहे हैं। वहां इस समय श्रम की भारी कमी है, इसलिए यह एक स्वाभाविक मेल है।” कंपनी ने हाल ही में मॉस्को क्षेत्र के साथ-साथ रूस के सुदूर पूर्वी इलाकों के लिए भी भर्ती शुरू की है।

रूसी उद्योग जगत भी इस संकट से जूझ रहा है। नॉरिल्स्क निकल जैसी बड़ी खनन कंपनियों और जहाज निर्माण निगम अक बार्स को हजारों कुशल कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। नॉरिल्स्क निकल के प्रवक्ता ने कहा, “कुशल कर्मियों की कमी पूरे रूसी उद्योग के लिए मुख्य चुनौतियों में से एक बनी हुई है।”

जनसांख्यिकी विशेषज्ञ इगोर एफ्रेमोव का मानना है कि यह संकट अस्थायी नहीं है। उन्होंने कहा, “रूस की आबादी लगातार बूढ़ी होती जाएगी और युवाओं व बच्चों का अनुपात घटता रहेगा। यह श्रम बाजार का अस्थायी संकट नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक वास्तविकता है, जो दशकों तक बनी रहेगी और जिसके अनुसार अर्थव्यवस्था को खुद को ढालना होगा।” इन परिस्थितियों में, भारत जैसे देशों से आने वाले श्रमिक रूस के लिए न केवल विकल्प, बल्कि भविष्य की आवश्यकता बनते जा रहे हैं।

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