नाट्य प्रस्तुति के बाद दर्शकों की आंखों में आंसू थे और हॉल में तालियों की गर्जना थी। महाशिवरात्रि के दिन आचार्य प्रशांत का जन्मदिन भी था और उन्होंने अपने श्रोताओं को एक एकल नाट्य प्रस्तुति का उपहार दिया। करीब 2 लाख लोग गीता ऐप के माध्यम से कार्यक्रम से लाइव जुड़े।
प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत चौंकाने वाली रही। पर्दा उठा और आचार्य प्रशांत मोहन राकेश के प्रसिद्ध हिंदी नाटक ‘लहरों के राजहंस’ के केंद्रीय पात्र के रूप में सामने थे।
नाटक का उद्देश्य समझाते हुए आचार्य प्रशांत ने कहा, “यह एक ललकार थी जो रंगमंच से गूंजी कि क्या तुम्हें सचमुच दुर्बल बनकर ही जीना है? तुम्हें क्या मिल रहा है अपने आप को कमजोर घोषित करके?”
उन्होंने कहा कि इंसान मजबूरी का बहाना पकड़कर अपने बंधनों की जिंदगी को चलाए रखना चाहता है और नाटक का संदेश यही था कि जहां कहीं भी दुख, शोषण या अन्याय है, वह मजबूरी के कारण नहीं बल्कि हमारी अपनी अनुमति और सहमति से चल रहा है।
एक दर्शक ने इस अनुभव को अपने शब्दों में बयां किया। उन्होंने कहा, “मैं अभी भी उस अनुभव की खुमारी में हूं। आम तौर पर आचार्य जी पढ़ाते हैं और सवाल लेते हैं, लेकिन आज उन्होंने आम व्यक्ति और बुद्धत्व के संघर्ष पर आधारित नाटक प्रस्तुत किया। मैंने देखा कैसे एक व्यक्ति जीवन के द्वन्द में फंसकर दो फाड़ हो जाता है। ये कहानी मेरी ही थी।”
यह प्रस्तुति अचानक नहीं हुई। आचार्य प्रशांत की अभिनय प्रतिभा की जड़ें पुरानी हैं। आईआईएम अहमदाबाद में अध्ययन के दौरान वे रंगमंच में गहरे रूप से सक्रिय रहे, जहां उन्होंने ‘राइनोसेरस’, ‘पगला घोड़ा’ और ‘नाइट ऑफ जनवरी 16’ जैसे नाटकों में न सिर्फ अभिनय किया बल्कि निर्देशन भी संभाला। आज उसी रंगमंच की परंपरा को उन्होंने अपनी शिक्षा पद्धति का हिस्सा बना लिया।
महाशिवरात्रि के संदेश पर बोलते हुए आचार्य प्रशांत ने शिव के तांडव को एक भीतरी संकेत बताया। उन्होंने कहा, “शिव की प्रलय बाहर की नहीं है। आपने अपने भीतर जितने भ्रम, छल और अहंकार पकड़ रखा है, उसका जो विध्वंस हो उसी का नाम शिवत्व है।”
उन्होंने कहा कि धर्म और अध्यात्म सत्य की प्राप्ति के नाम नहीं हैं, बल्कि झूठ से मुक्ति का मार्ग हैं, और महाशिवरात्रि उसी सृजनात्मक विध्वंस का पर्व है।
नाट्य प्रस्तुति के बाद दर्शकों के साथ नाटक पर आधारित प्रश्नोत्तर सत्र हुआ। उसके बाद आचार्य प्रशांत ने अवधूत गीता के श्लोकों पर विशेष सत्र लिया। गीता की प्रासंगिकता पर उन्होंने कहा, “गीता कोई साधारण वक्तव्य नहीं है। जीवन के युद्धक्षेत्र में उतरी धर्म की वाणी है। जो कुछ कुरुक्षेत्र में हो रहा था वो आज भी हो रहा है।” कार्यक्रम का समापन पुस्तक हस्ताक्षर सत्र के साथ हुआ।
एक श्रोता ने कहा, “आचार्य प्रशांत का कार्यक्रम कोई साधारण आयोजन नहीं है। यह समाज को बदलने वाली एक बड़ी क्रांति है।” वहीं एक अन्य श्रोता ने बताया कि उन्होंने पहली बार आचार्य प्रशांत को यूट्यूब पर आधे मिनट की एक क्लिप में देखा था।
उन्होंने कहा, “उस छोटी सी क्लिप में ही मुझे लगा कि इनकी बात में निडरता और सच्चाई है। उसके बाद एक पूरा हफ्ता मैंने सिर्फ उन्हें सुना, और अब लंबे समय से लाइव गीता सत्रों से जुड़ गई हूं।”
इस कार्यक्रम में आमने-सामने जुड़ने के लिए प्रतिभागियों का चयन हजारों आवेदकों में से किया गया था। गीता सत्रों के प्रति गंभीरता और स्वाध्याय के प्रति समर्पण को चयन की कसौटी बनाया गया। आयोजन स्थल पर एक भव्य प्रदर्शनी भी दर्शकों का ध्यान खींच रही थी। इसमें पिछले कई महीनों में आचार्य प्रशांत की गोवा से हैदराबाद, कोलकाता से चेन्नई तक की यात्रा को चित्रों के माध्यम से दर्शाया गया।
आयोजन आचार्य प्रशांत के पिछले छह महीनों के राष्ट्रव्यापी अभियान की निरंतरता में है। इस दौरान उन्होंने कई शहरों की यात्रा की और 13 आईआईटी, आईआईएससी और आईआईएम सहित देश के अन्य दर्जनों शीर्ष संस्थानों को संबोधित किया।
आचार्य प्रशांत प्रसिद्ध लेखक, दार्शनिक और प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र आचार्य प्रशांत अद्वैत वेदांत और दुनियाभर के बोध साहित्य की शिक्षाओं को आधुनिक जीवन के संदर्भ में प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं।
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