एस. जयशंकर शनिवार को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पहुंच रहे हैं। ईरान युद्ध शुरू होने के बाद खाड़ी क्षेत्र का दौरा करने वाले वे पहले मंत्री होंगे। इस अहम दौरे में मौजूदा अस्थिर हालात के बीच ऊर्जा सुरक्षा प्रमुख मुद्दा रहेगा। जयशंकर का यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब हरदीप सिंह पुरी कतर के दौरे पर हैं, जहां भारत एलएनजी आपूर्ति को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। कतर भारत के कुल एलएनजी आयात का लगभग 4 प्रतिशत आपूर्ति करता है, लेकिन होर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान के चलते वहां उत्पादन प्रभावित हुआ है।
इससे पहले मॉरीशस में आयोजित हिंद महासागर सम्मेलन के दौरान जयशंकर ने घोषणा की थी कि भारत मॉरीशस के साथ तेल और गैस आपूर्ति के लिए सरकार-से-सरकार समझौते को अंतिम रूप दे रहा है। इससे भारत क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा प्रदाता के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जबकि खुद अपनी आपूर्ति भी सुनिश्चित करने में जुटा है।
ईरान के साथ संबंधों को लेकर जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि भारत का होर्मुज़ मार्ग पर कोई “ब्लैंकेट अरेंजमेंट” नहीं है। इसके अलावा उन्होंने दो भारतीय एलपीजी जहाजों को सुरक्षित मार्ग मिलने को किसी ‘क्वीड प्रो क्वो’ का हिस्सा मानने से ख़ारिज किया। इसे अमेरिका को आश्वस्त करने और ईरान के साथ संतुलन बनाए रखने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम करने के लिए इस्लामाबाद में बातचीत जारी है। साथ ही, यह यात्रा अबू धाबी द्वारा युद्ध के दौरान भारतीय समुदाय और फंसे हुए नागरिकों की सहायता के प्रति आभार जताने के रूप में भी देखी जा रही है। दौरे के दौरान जयशंकर अपने समकक्ष अब्दुल्ला बिन ज़ायद अल नाहयान सहित कई वरिष्ठ नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें करेंगे। यह दौरा उस समय हो रहा है जब हाल के महीनों में भारत और यूएई के बीच उच्च-स्तरीय संपर्क तेज हुए हैं।
कुछ समय पहले यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान ने भारत का संक्षिप्त दौरा कर नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। वहीं अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान फरवरी में एआई इम्पैक्ट समिट के लिए नई दिल्ली आए थे। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय सहयोग मंत्री रीम अल हाशिमी ने भी हाल ही में भारत का दौरा किया था।
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