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बलूचिस्तान: इतिहास और पाकिस्तान के दमन की कहानी!

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बलूचिस्तान एक ऐसा भूभाग है, जिसकी अपनी विशिष्ट पहचान और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। इतिहास गवाह है कि बलूचिस्तान हमेशा से एक स्वतंत्र सत्ता रहा है, जिसकी अपनी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था थी। बलूच लोग अपने स्वाभिमान, बहादुरी और स्वतंत्रता प्रेम के लिए प्रसिद्ध हैं। परंतु, 1948 में पाकिस्तान द्वारा इस पर अवैध रूप से कब्जा किए जाने के बाद से बलूचिस्तान के लोगों को अपने ही देश में पराया बना दिया गया। वहां के नागरिकों के अधिकारों का हनन किया गया, उनकी जमीनें छीनी गईं और उनकी संस्कृति को समाप्त करने का षड्यंत्र रचा गया। आज भी बलूच जनता पाकिस्तान सरकार के अत्याचारों का सामना कर रही है और अपनी स्वतंत्रता की मांग कर रही है।

बलूचिस्तान का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य देखें तो यह हमेशा से एक स्वतंत्र राज्य रहा है। 1666 में खानेट ऑफ़ कल्लात  की स्थापना हुई थी, जिसे बलूच राजनीतिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता का प्रतीक माना जाता है। ब्रिटिश शासन के दौरान इस क्षेत्र को दो भागों में विभाजित कर दिया गया—एक हिस्सा ब्रिटिश भारत के अधीन आ गया और दूसराखानेट ऑफ़ कल्लात के रूप में बना रहा। 1947 में जब भारत और पाकिस्तान को अलग किया गया, तो बलूचिस्तान ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी। 11 अगस्त 1947 को खानेट ऑफ़ कल्लात ने खुद को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया, लेकिन पाकिस्तान ने इसे स्वीकार नहीं किया और बलूचिस्तान को अपने अधिकार में लेने के प्रयास शुरू कर दिए।

मार्च 1948 में पाकिस्तान ने सैन्य बल का उपयोग करते हुए बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया। मीर अहमद यार खान, जो उस समय खानेट ऑफ़ कल्लात के शासक थे, पाकिस्तान के दबाव के आगे झुकने के लिए मजबूर हो गए और उन्हें विलय के लिए बाध्य कर दिया गया। यह पूरी प्रक्रिया न तो बलूच जनता की सहमति से हुई थी और न ही किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत। यह सरासर बलपूर्वक कब्जा था, जिसे बलूच लोगों ने कभी भी स्वीकार नहीं किया। इसके बाद से ही बलूचिस्तान में स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत हुई, जो आज भी जारी है।

पाकिस्तान ने बलूच जनता को दबाने के लिए हर संभव दमनकारी नीति अपनाई। बलूचिस्तान की प्राकृतिक संपदाओं को लूटकर पाकिस्तान के अन्य हिस्सों को समृद्ध किया गया, जबकि स्थानीय जनता गरीबी और बेरोजगारी से जूझती रही। बलूचिस्तान में विशाल प्राकृतिक गैस भंडार मौजूद हैं, जिससे पूरे पाकिस्तान को ऊर्जा मिलती है, लेकिन बलूच जनता को इसका कोई लाभ नहीं मिलता। इसके अलावा, बलूचिस्तान के खनिज संसाधनों का शोषण किया गया, लेकिन स्थानीय निवासियों को शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा गया।

बलूचिस्तान में पाकिस्तान द्वारा किए गए अत्याचारों की कहानी केवल आर्थिक शोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संगठित सैन्य दमन की गाथा भी है। हजारों बलूच नागरिकों को जबरन गायब कर दिया गया, जिनमें पत्रकार, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी शामिल थे। कई मामलों में गायब किए गए लोगों की लाशें बाद में सुनसान जगहों पर पाई गईं। बलूच मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह पाकिस्तान की सेना और गुप्तचर एजेंसियों द्वारा योजनाबद्ध नरसंहार है।

बलूच भाषा, संस्कृति और इतिहास को मिटाने के लिए भी पाकिस्तान सरकार ने कठोर कदम उठाए है। बलूच भाषा को शिक्षा प्रणाली से बाहर कर दिया गया है, स्कूलों और विश्वविद्यालयों में इसे पढ़ाने की अनुमति नहीं है। बलूच इतिहास को पाठ्यपुस्तकों से हटाने के साथ ही बलूच युवाओं को उर्दू और पंजाबी संस्कृति अपनाने के लिए बाध्य किया जा रहा है। यह एक सुनियोजित सांस्कृतिक नरसंहार है, जिसका उद्देश्य बलूच जनता की पहचान को समाप्त करना है।

बलूच जनता के खिलाफ दमन केवल बलूचिस्तान तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि पाकिस्तान सरकार ने एक नीतिगत जनसंख्या परिवर्तन (Demographic Change) की प्रक्रिया शुरू की है। बड़ी संख्या में पंजाबी और बाहरी लोगों को बलूचिस्तान में बसाया जा रहा है, जिससे स्थानीय बलूच आबादी अल्पसंख्यक हो जाए और उनकी स्वतंत्रता की मांग कमजोर पड़ जाए। इस प्रक्रिया के तहत बलूच युवाओं को शिक्षा और रोजगार से वंचित किया जा रहा है, ताकि वे अपनी आजादी की लड़ाई को आगे न बढ़ा सकें।

इन अत्याचारों के खिलाफ बलूच लोगों ने कई बार विद्रोह किया। 1948, 1958, 1973, 1990 और 2005 में बड़े पैमाने पर स्वतंत्रता आंदोलन हुए, लेकिन पाकिस्तान की सेना ने हर बार इन्हें बेरहमी से कुचल दिया। इसके बावजूद, बलूचिस्तान में स्वतंत्रता संग्राम जारी है। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA), बलूच रिपब्लिकन आर्मी (BRA) और बलूच लिबरेशन फ्रंट (BLF) जैसे संगठनों ने पाकिस्तान की सेना और सरकारी तंत्र के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष छेड़ रखा है।

आज बलूचिस्तान का संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह मानवाधिकारों, न्याय और स्वतंत्रता का अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। दुनिया भर में रहने वाले बलूच प्रवासी संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। विभिन्न मानवाधिकार संगठनों ने भी पाकिस्तान सरकार की नीतियों की निंदा की है और बलूच लोगों के अधिकारों के समर्थन में बयान दिए हैं।

बलूचिस्तान की जनता आज भी पाकिस्तान की दमनकारी नीतियों के खिलाफ संघर्ष कर रही है। यह संघर्ष केवल भू-राजनीतिक नहीं है, बल्कि यह बलूच जनता की अस्मिता, संस्कृति और स्वतंत्रता का संघर्ष है। बलूचिस्तान कभी एक स्वतंत्र राष्ट्र था और बलूच जनता आज भी उसी स्वतंत्रता की पुनः स्थापना के लिए लड़ रही है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस संघर्ष को पहचानने की जरूरत है और बलूच जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाने की जरुरत है।

बलूच जनता के लिए स्वतंत्रता केवल एक सपना नहीं, बल्कि उनका ऐतिहासिक अधिकार है। पाकिस्तान सरकार के अत्याचारों के बावजूद, बलूचों का यह संघर्ष खत्म नहीं होगा। आज दुनियाभर से बलूच संघर्षकारीयो के जाफर एक्सप्रेस पर किए गए हमलों पर निंदा हो रही है, जो पिछले कई दशकों से पाकिस्तानी सरकार द्वारा बलूच नागरिकों पर दमन, अत्याचारों और नरसंहार की घटनाओं पर गायब रही है। अगर वैश्विक बलूच लोगों के स्वतंत्रता के लिए मददगार नहीं हो सकते तो उन्हें भी बलूच स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों के खिलाफ बोलने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसा करना वैश्विक नेताओं को नरसंहारकर्ताओं के पक्ष में और मानवीय अधिकारों के खिलाफ खड़ा करता है।

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