तेल बाजार में भारी उथल-पुथल के कारण कच्चा तेल उबलने लगा है। कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। ईरान के खिलाफ इजरायल और अमेरिका के युद्ध के कारण फारस की खाड़ी में स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के जरिए होने वाली ईंधन आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। रिपोर्टों के अनुसार ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 109 से 114 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गई, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) करीब 109 से 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेल की बढ़ती कीमतों का बचाव करते हुए इसे ईरान के परमाणु खतरे के खिलाफ कार्रवाई की अस्थायी कीमत बताया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, “ईरान के न्यूक्लियर खतरे के खत्म होने पर शॉर्ट-टर्म तेल की कीमतें तेज़ी से गिरेंगी, अमेरिका और दुनिया की सुरक्षा और शांति के लिए चुकाने के लिए बहुत छोटी कीमत है। सिर्फ़ मूर्ख ही अलग तरह से सोचेंगे!”
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, प्रमुख मध्य-पूर्वी तेल उत्पादकों द्वारा उत्पादन घटाए जाने और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के प्रभावी रूप से बंद होने के कारण तेल बाजार में तेजी आई है। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड लगभग 20.75 प्रतिशत यानी 18.83 डॉलर की बढ़त के साथ 109.75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है, जबकि ब्रेंट क्रूड भी 18 प्रतिशत से अधिक बढ़कर करीब 109.48 डॉलर प्रति बैरल हो गया। विशेषज्ञों के अनुसार यह 1980 के दशक की शुरुआत के बाद तेल वायदा कारोबार में सबसे बड़े साप्ताहिक उछालों में से एक है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ईंधन मार्गों में से एक है, जिसके जरिए वैश्विक तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा गुजरता है। संघर्ष से जुड़े हमलों और खतरों के कारण इस क्षेत्र में टैंकरों की आवाजाही काफी धीमी हो गई है और कई जहाजों ने इस मार्ग से गुजरने से परहेज करना शुरू कर दिया है।
गल्फ क्षेत्र के कुछ उत्पादकों ने निर्यात मार्ग बाधित होने के कारण उत्पादन कम करना शुरू कर दिया है। कई जगहों पर भंडारण टैंक तेजी से भर रहे हैं, जिससे कुछ कंपनियों को कुएं बंद करने या उत्पादन धीमा करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
तेल कीमतों में उछाल का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों पर भी दिखा। एशियाई शेयर बाजारों में तेज गिरावट दर्ज की गई। जापान का प्रमुख शेयर सूचकांक करीब पांच प्रतिशत गिर गया, जबकि दक्षिण कोरिया के बाजार में सात प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखी गई। दोनों अर्थव्यवस्थाएं ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं। कुछ बाजार अनुमानों के अनुसार वर्ष के अंत तक कच्चे तेल की कीमत 143 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। ऊर्जा इतिहासकार डैनियल यर्गिन ने चेतावनी दी है कि यह स्थिति दैनिक तेल उत्पादन के लिहाज से “दुनिया के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा व्यवधान” बन सकती है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट का दबाव एशिया और यूरोप पर अमेरिका की तुलना में अधिक पड़ सकता है, क्योंकि ये क्षेत्र फारस की खाड़ी से आने वाली ईंधन आपूर्ति पर अधिक निर्भर हैं। हालांकि वैश्विक तेल कीमतों में बढ़ोतरी का असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है, क्योंकि इससे परिवहन और खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ने का खतरा रहता है। इतिहास में 1973 के अरब तेल प्रतिबंध और 1979 की ईरानी क्रांति जैसे घटनाक्रमों ने भी वैश्विक तेल बाजार में भारी उछाल और आर्थिक संकट पैदा किए थे।
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